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Wednesday, March 4, 2026
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में डेटा का ‘खेल’! CSDS पर गिरी गाज, ICSSR ने थमाया नोटिस

ICSSR ने कहा कि जानकारी में आया है कि CSDS जो ICSSR द्वारा फंडेड है के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने महाराष्ट्र चुनाव के डेटा विश्लेषण का हवाला देते हुए मीडिया में बयान दिए थे,जिन्हें बाद में वापस ले लिया।

नई दिल्ली/ रफ्तार डेस्क। देश की प्रतिष्ठित शोध संस्था CSDS (Centre for the Study of Developing Societies) अब एक बड़े विवाद में फंसती नजर आ रही है। महाराष्ट्र चुनाव के दौरान मतदाता आंकड़ों को लेकर सोशल मीडिया पर किए गए विवादास्पद दावे अब संस्था पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। ICSSR (भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद) ने CSDS को नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

क्या है पूरा मामला?

CSDS से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी प्रो. संजय कुमार ने बीते साल महाराष्ट्र चुनाव के दौरान कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सार्वजनिक किए थे। उनके मुताबिक, नाशिक पश्चिम में मतदाता संख्या में 47% और हिंगना में 43% की जबरदस्त वृद्धि, जबकि रामटेक और देवलाली में क्रमश: 38% और 36% की गिरावट दर्ज की गई थी।

इन आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस ने बीजेपी पर चुनावी गड़बड़ी के आरोप जड़ दिए। लेकिन मामला तब पलट गया जब प्रो. संजय कुमार ने अपने ट्वीट डिलीट कर माफी मांग ली और माना कि आंकड़ों की तुलना में गलती हुई थी।

 ICSSR ने जताई नाराजगी

ICSSR ने इस पूरे मामले को बेहद गंभीर बताया है। परिषद ने कहा कि जिस संस्था को सरकारी फंड मिलता है, उसके वरिष्ठ सदस्य का इस तरह भ्रामक और पक्षपातपूर्ण बयान देना न केवल शोध की साख को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है। परिषद ने खासतौर पर इस बात पर आपत्ति जताई कि CSDS ने चुनाव आयोग द्वारा संचालित SVEEP (Systematic Voter Education and Electoral Participation) कार्यक्रम को भी अपने विश्लेषण में गलत ढंग से प्रस्तुत किया।

 संविधान की गरिमा सर्वोपरि: ICSSR

ICSSR ने कहा, “भारत का चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसने दशकों से निष्पक्ष चुनाव कराए हैं। इस पर शक जताना लोकतंत्र की नींव को हिलाने जैसा है।” परिषद ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसी किसी भी गलती को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि प्रो. संजय कुमार ने माफी मांग ली है और इसे “मानवीय त्रुटि” बताया है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब इन आंकड़ों के दम पर राजनीतिक दल गंभीर आरोप लगाने लगें, तो क्या सिर्फ माफी से बात खत्म हो जाती है?

 अब आगे क्या?

सूत्रों की मानें तो ICSSR ने CSDS से स्पष्टीकरण मांगा है। यदि जवाब संतोषजनक नहीं रहा, तो फंडिंग रोकी जा सकती है या फिर अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है। यह घटनाक्रम देश की अन्य शोध संस्थाओं के लिए भी एक कड़ा संदेश है डेटा की ताकत के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है।

यह मामला सिर्फ एक संस्था का नहीं है, यह लोकतंत्र की पारदर्शिता, शोध की विश्वसनीयता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा से जुड़ा है। अब सबकी नजरें CSDS के जवाब और ICSSR की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं।

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