नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। असम विधानसभा चुनाव में कुछ महीने बाकी हैं, लेकिन सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए नया दांव खेल रही है। पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने टिकट बंटवारे की पुरानी हाईकमान संस्कृति से अलग एक नया फॉर्मूला लागू किया है। सवाल है क्या यह प्रयोग मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के मजबूत किले को भेद पाएगा?
टिकट चयन में बड़ा बदलाव
कांग्रेस ने इस बार जमीनी फीडबैक के आधार पर उम्मीदवार चुनने का फैसला किया है। पहले स्क्रीनिंग कमेटी दिल्ली में बैठकर राज्य नेताओं से चर्चा करती थी। लेकिन अब प्रियंका गांधी ने कमेटी के सदस्यों को जिलों में भेजकर स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और सिविल सोसायटी से सीधे राय लेने का निर्देश दिया है।
स्क्रीनिंग कमेटी को दी गई जिम्मेदारी
असम के लिए बनी स्क्रीनिंग कमेटी की कमान प्रियंका गांधी के हाथ में है। कमेटी में सांसद सप्तगिरी शंकर उलाका, इमरान मसूद और वरिष्ठ नेता सिरिवेल्ला प्रसाद शामिल हैं। तीनों नेताओं को अलग-अलग जिलों की जिम्मेदारी दी गई है। इमरान मसूद को मुस्लिम आबादी वाले जिले उलाका को आदिवासी बहुल इलाके अन्य सदस्यों को अलग सामाजिक समीकरण वाले क्षेत्र यह बंटवारा सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखकर किया गया है।
2021 की हार से सबक?
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 95 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन सिर्फ 29 सीटें जीत पाई। वहीं बीजेपी ने 60 सीटों पर जीत दर्ज की। असम में कुल 126 विधानसभा सीटें हैं।कांग्रेस नेताओं का मानना है कि अगर नया टिकट चयन मॉडल सफल रहा तो इसे दूसरे राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, यह प्रयोग पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करेगा। इससे स्थानीय नेताओं की राय को ज्यादा महत्व मिलेगा और गुटबाजी कम हो सकती है। कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा कि असम में बदलाव की लहर है और लोग बीजेपी के खिलाफ वोट करेंगे। उन्होंने भरोसा जताया कि कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी। बीजेपी भी चुनावी तैयारी में जुटी है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन ने असम दौरे के दौरान कार्यकर्ताओं से हर बूथ पर 50% वोट सुनिश्चित करने का लक्ष्य दिया। बीजेपी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश में है। असम का चुनाव कांग्रेस के लिए ‘करो या मरो’ जैसा माना जा रहा है। प्रियंका गांधी का यह नया प्रयोग पार्टी को नई ऊर्जा दे सकता है, लेकिन असली परीक्षा चुनाव नतीजों में होगी।





