नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद एक बार फिर सुर्खियों में हैं। दिल्ली से लौटते ही उन्होंने अपने आवास पर कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई और पंचायत चुनाव की रणनीति पर चर्चा की। लेकिन इस बैठक से ज्यादा चर्चा में रहा उनका बयान, जो सीधे भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच को लेकर था। मसूद ने सवाल उठाया कि जब देश में आतंकी हमलों से परिवार उजड़ रहे हैं, हमारी बहनों का सिंदूर मिट रहा है, तब पाकिस्तान से क्रिकेट खेलना कैसी देशभक्ति है?
”टीवी चैनलों पर पाकिस्तानी कलाकारों को बैन कर दिया जाता है”
मसूद ने तंज कसते हुए कहा, टीवी चैनलों पर पाकिस्तानी कलाकारों को बैन कर दिया जाता है, फिल्मों और ड्रामों पर रोक लगा दी जाती है, लेकिन क्रिकेट को क्यों नहीं छुआ जाता? इसका कारण साफ है कि यहां से पैसा आता है। जहां पैसा बहता है, वहीं सरकार का झुकाव भी रहता है। उनके इस बयान ने न केवल खेल और राजनीति के बीच के रिश्ते पर बहस छेड़ दी, बल्कि सत्ता की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े किए।
भारत-पाकिस्तान मुकाबला हमेशा से ही भावनाओं का केंद्र रहा
भारत-पाकिस्तान मुकाबला हमेशा से ही भावनाओं का केंद्र रहा है। सीमा पर तनाव के बीच जब दोनों देशों के खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं तो यह महज खेल नहीं रह जाता, यह राष्ट्रीय अस्मिता और जनभावनाओं से जुड़ जाता है। इमरान मसूद का बयान इन्हीं भावनाओं को हवा देता दिखा। विपक्ष की यह रणनीति साफ है कि सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाए—एक ओर पाकिस्तानी कलाकारों और कार्यक्रमों पर रोक, दूसरी ओर क्रिकेट के जरिये जारी कारोबारी रिश्ते।
”विपक्ष की जमीनी राजनीति को मजबूत करने का संकेत है”
बैठक का दूसरा बड़ा मुद्दा पंचायत चुनाव रहा। मसूद ने साफ कहा कि जिला पंचायत का चुनाव दरवाजे पर खड़ा है और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अभी से कमर कसनी होगी। उन्होंने पंचायत चुनाव को कांग्रेस की ताकत और जमीनी पकड़ का आधार बताया। राष्ट्रीय मुद्दों के बीच स्थानीय चुनावों को जोड़ने की यह कोशिश विपक्ष की जमीनी राजनीति को मजबूत करने का संकेत है। बिहार से उठी चिंगारी अब पूरे देश में फैल चुकी है।
लेकिन मसूद यहीं नहीं रुके। उन्होंने वोट चोरी का मुद्दा उठाते हुए 24 अगस्त को देशव्यापी प्रदर्शन और यात्रा का ऐलान किया। उनका दावा है कि बिहार से उठी चिंगारी अब पूरे देश में फैल चुकी है। नारा गूंज रहा है वोट चोर गद्दी छोड़ मसूद का आरोप है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई है। मरे हुए लोगों के नाम जोड़ दिए गए, असली मतदाताओं के नाम काट दिए गए और करोड़ों वोट प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि जब एक ही प्रदेश में 64 लाख वोट काट दिए जाएं तो लोकतंत्र कहां बचता है?
”भविष्य में क्या बदलाव हो जाए, कोई भरोसा नहीं”
सांसद ने चुनाव आयोग पर भी तीखे सवाल उठाए। उनका कहना था कि आयोग अब जवाब देने की स्थिति में नहीं है। राहुल गांधी ने जो सवाल उठाए, उनका कोई ठोस जवाब नहीं मिला। मसूद ने जनता से अपील की कि अपने वोट खुद बनवाएं, अपने कागज खुद तैयार रखें, क्योंकि भविष्य में क्या बदलाव हो जाए, कोई भरोसा नहीं।
मसूद ने नए विधेयक को भी निशाने पर लिया
बैठक में मसूद ने संसद से पास हुए नए विधेयक को भी निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विधेयक छोटी पार्टियों को तोड़ने और विपक्ष को कमजोर करने के लिए बनाया गया है। सबसे गंभीर आरोप ईडी पर रहा। मसूद ने कहा कि ईडी को इतना शक्तिशाली बना दिया गया है कि वह किसी को भी 30 दिन तक जेल में रख सकती है और फिर उसकी पार्टी तोड़ दी जाती है। विपक्ष लंबे समय से यही आरोप लगाता रहा है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार की तरह हो रहा है और मसूद ने इसी मुद्दे को आगे बढ़ाया।
राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का मुद्दा भी बना दिया’
दरअसल, मसूद के पूरे भाषण में तीन परतें साफ दिखाई देती हैं। पहली परत भावनात्मक है। भारत-पाकिस्तान मैच और शहीदों के परिवारों की पीड़ा। दूसरी परत स्थानीय है। पंचायत चुनाव की तैयारी और कार्यकर्ताओं को लामबंद करना। तीसरी परत राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ी है। वोट चोरी, चुनाव आयोग की भूमिका और ईडी की बढ़ती ताकत। इन तीनों को एक ही मंच से जोड़कर उन्होंने न केवल अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दिया बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का मुद्दा भी बना दिया।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे बयान विपक्ष की रणनीति का हिस्सा हैं। एक ओर जनता की भावनाओं को सीधे छूना, दूसरी ओर लोकतंत्र और संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठाना। इमरान मसूद जैसे नेता यह समझते हैं कि आम मतदाता भावनात्मक मुद्दों पर ज्यादा तेजी से प्रतिक्रिया देता है। भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच पर दिया गया उनका बयान इसी दिशा में देखा जा रहा है।
लेकिन यह भी सच है कि राजनीति में ऐसे बयान दोधारी तलवार साबित होते हैं। सत्ता पक्ष इसे देशभक्ति के अपमान के रूप में पेश कर सकता है। मसूद का बयान उनके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकता है, खासकर उस वक्त जब राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा एजेंडा बना हुआ है।
फिर भी मसूद की बातों में जो गंभीरता है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि वाकई मतदाता सूची में छेड़छाड़ हो रही है, वोटों की कटौती और फर्जी नाम जोड़े जा रहे हैं, तो यह लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार है। यदि ईडी जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने के लिए हो रहा है, तो यह संवैधानिक संतुलन के लिए खतरनाक है। और यदि सरकार आर्थिक हितों के चलते पाकिस्तान से क्रिकेट खेलती है, तो जनता को इसका जवाब तो चाहिए ही।
इमरान मसूद का यह बयान केवल एक तात्कालिक विवाद नहीं है। यह उस गहरी बहस की तरफ इशारा करता है जो आज भारत में चल रही है। क्या हमारी राजनीति भावनाओं और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द घूमेगी, या फिर लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर केंद्रित होगी? पंचायत से लेकर संसद तक, मसूद ने इन मुद्दों को जोड़ने की कोशिश की है।
अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में उनकी यह रणनीति कांग्रेस और विपक्ष को कितना फायदा पहुंचाती है। क्या यह जनता के बीच असली मुद्दों को केंद्र में लाने में सफल होगी या फिर सत्ता पक्ष इसे देशविरोधी बयान बताकर पलटवार करेगा। फिलहाल इतना तय है कि, सहारनपुर से निकला यह बयान राष्ट्रीय राजनीति में गूंज पैदा कर चुका है। भारत-पाकिस्तान मैच से लेकर पंचायत चुनाव और वोट चोरी से लेकर ईडी की ताकत तक इमरान मसूद ने एक ही सांस में कई मुद्दे उठाकर सियासी बहस को और तीखा बना दिया है।





