नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) कार्यक्रम और विपक्ष की ओर से लगाए गए ‘वोट चोरी’ के आरोपों ने देशभर में सियासी माहौल गरमा दिया है। इन आरोपों के जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने रविवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने इन दावों को पूरी तरह निराधार बताया। साथ ही, बिना किसी का नाम लिए, राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें या तो हलफनामा दाखिल करना चाहिए या फिर देश से माफी मांगनी चाहिए। इस बयान के बाद विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच टकराव और तेज हो गया है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की तैयारी में विपक्ष
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को लेकर अब नई बहस शुरू हो गई है। चर्चा है कि कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दल CEC को पद से हटाने का प्रस्ताव ला सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई औपचारिक निर्णय या पुष्टि नहीं हुई है। कांग्रेस सांसद सैयद नासिर हुसैन ने सोमवार को बयान दिया कि इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर अब तक कोई बातचीत नहीं हुई है, लेकिन यदि हालात की मांग हुई तो कांग्रेस नियमों के तहत ऐसा प्रस्ताव ला सकती है। यदि विपक्ष यह कदम उठाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ी घटना होगी।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिल और सख्त है। यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को हटाने की प्रक्रिया के समान है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकार के प्रभाव से मुक्त रखने की विशेष व्यवस्था की गई है ताकि वह निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें। इसी कारण उन्हें साधारण बहुमत से नहीं हटाया जा सकता। मुख्य चुनाव आयुक्त का पद पूरी तरह संवैधानिक और स्वतंत्र होता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया संसद से शुरू होती है। यदि उन पर दुर्व्यवहार या अक्षमता के आरोप लगते हैं, तो संसद के किसी भी सदन लोकसभा या राज्यसभा में उन्हें हटाने का प्रस्ताव लाया जा सकता है। लोकसभा में इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। हालांकि इसे महाभियोग नहीं, बल्कि “हटाने की प्रक्रिया” कहा जाता है। प्रस्ताव पेश होने के बाद लोकसभा के स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन इस पर विचार करते हैं। उनके पास प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होता है। यदि वे प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों वाली एक समिति का गठन किया जाता है।
कैसे होती है मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आरोपों की जांच?
लोकसभा के पूर्व महासचिव पी.डी.टी. आचारी के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव पर भी महाभियोग जैसी प्रक्रिया अपनाई जाती है। संबंधित सदन के अध्यक्ष (लोकसभा में स्पीकर या राज्यसभा में चेयरमैन) आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करते हैं। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश करते हैं, जबकि किसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद इसके सदस्य होते हैं। यह समिति मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोपों की विस्तार से जांच करती है। जांच के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है। जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट स्पीकर या चेयरमैन को सौंपती है। यदि रिपोर्ट में आरोप सही पाए जाते हैं और समिति मुख्य चुनाव आयुक्त को दुर्व्यवहार या अक्षमता का दोषी मानती है, तो उन्हें हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है।
संसद में विशेष बहुमत से पारित होता है प्रस्ताव
अगर जांच समिति अपनी रिपोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त को दोषी ठहराती है, तो हटाने का प्रस्ताव संबंधित सदन में दोबारा पेश किया जाता है। इस प्रस्ताव को पारित करने के लिए दो स्तरों पर बहुमत की आवश्यकता होती है। पहला, सदन के कुल सदस्यों का साधारण बहुमत (यानी 50% से अधिक) और दूसरा, सदन में उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। इसी को ‘विशेष बहुमत’ कहा जाता है।
एक सदन से प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद, इसे दूसरे सदन में भेजा जाता है, जहां इसे फिर से उसी विशेष बहुमत से पारित करना अनिवार्य होता है। जब दोनों सदन प्रस्ताव को पारित कर देते हैं, तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। संसद की मंजूरी के बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। यह पूरी प्रक्रिया संसद के एक ही सत्र में पूरी की जानी जरूरी होती है।
जब राष्ट्रपति दोनों सदनों से पारित प्रस्ताव को स्वीकृति दे देते हैं, तब जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाया जाता है। यह प्रक्रिया बेहद कठोर और लंबी इसलिए रखी गई है ताकि मुख्य चुनाव आयुक्त स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम कर सकें, किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर। अब तक भारत में किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को इस संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए नहीं हटाया गया है, जो इस पद की गरिमा और संस्थागत स्वतंत्रता को दर्शाता है।
जब बीजेपी ने उठाया था चुनाव आयुक्त को हटाने का मुद्दा
यूपीए-2 सरकार के दौरान, साल 2006 में उस समय के मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी। इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने चावला को हटाने की मांग करते हुए एक औपचारिक प्रस्ताव तैयार किया, जिस पर एनडीए के 200 से ज्यादा सांसदों के हस्ताक्षर थे। हालांकि, यह प्रस्ताव तब के लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद बीजेपी ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया, लेकिन वहां से भी उसे कोई लाभ नहीं मिला।
अब जबकि कांग्रेस की ओर से संभावित रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव लाने की चर्चा है, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी अपने सहयोगी दलों को इस कदम के लिए राजी कर पाती है। साथ ही, प्रस्ताव यदि आता है तो उसे पहले किस सदन में पेश किया जाएगा, यह एक अहम पहलू होगा। इसके अलावा, प्रस्ताव की अगली दिशा इस बात पर भी निर्भर करेगी कि लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा चेयरमैन उसे स्वीकार करते हैं या अस्वीकार करते हैं, क्योंकि प्रस्ताव को मंजूरी देने या खारिज करने का अधिकार पूरी तरह उन्हीं के हाथ में होता है।




