नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। मुंबई में बीएमसी चुनाव 2026 से पहले सियासत अपने चरम पर पहुंच गई है। मेयर पद की लड़ाई अब सीधे पहचान और धर्म के मुद्दे तक जा पहुंची है। AIMIM नेता वारिस पठान ने हाल ही में कहा कि एक दिन ऐसा आएगा जब हिजाब पहनने वाली महिला मुंबई की मेयर बनेगी। वारिस पठान ने तर्क दिया कि संविधान समानता की बात करता है, तो पठान, खान, अंसारी, शेख या कुरैशी क्यों नहीं मेयर बन सकते। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के इस बयान को सियासी संदेश और चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
बयान आते ही शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने कड़ा पलटवार किया। पार्टी प्रवक्ता आनंद दुबे ने कहा कि मुंबई का मेयर मराठी हिंदू ही होगा और AIMIM जानबूझकर हिंदू-मुस्लिम मुद्दा उछालकर बीजेपी के लिए लाभ कर रही है। शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी कहा कि देश में राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे बड़े पदों पर मुस्लिम रहे हैं, इसलिए इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से भड़काना सही नहीं है।
2011 की जनगणना के अनुसार मुंबई में हिंदू आबादी लगभग 61 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी करीब 25 प्रतिशत है। इसी जनसांख्यिकी के आधार पर राजनीतिक दल अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। मेयर की कुर्सी को लेकर यह बहस तब और तेज हुई जब राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे के साथ आने के बाद दावा किया कि मुंबई का मेयर मराठी होगा। अब चुनावी माहौल और गरम हो गया है, और राजनीतिक विश्लेषक इस बहस के चुनावी नतीजों पर पड़ने वाले प्रभाव पर नजर बनाए हुए हैं।
यह मामला न सिर्फ बीएमसी चुनाव में धार्मिक पहचान और समानता के मुद्दे को उभार रहा है, बल्कि यह साफ संकेत भी देता है कि 2026 के मुंबई चुनाव में सियासी बयानबाजी और पहचान आधारित राजनीति अहम भूमिका निभा सकती है।





