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बिहार: बेबसी में एक बार फिर लौटने लगे परदेसी

गोपालगंज, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। कटिहार के छवना गांव के रहने वाले गणेश कुमार अपने ही गांवों के कुछ लोगों के साथ गोपालगंज बस अड्डे पर कटिहार जाने के लिए बस के इंतजार में खड़े हैं। इनके चेहरे पर अपने राज्य पहुंचने का सुकून है तो अपने गांव पहुंचने की व्यग्रता भी है। चेहरे पर बेबसी और चिंता की लकीरें लिए ये इस बस से उस बस तक कटिहार जाने की राह खोज रहे हैं। गणेश अपने गांव के ही कई लोगों के साथ नोएडा में एक कारखाने में काम करते हैं। कोरोना फैलने के बाद कारखाना में काम बंद हो गया, तो पिछली बार से डरे हुए यह अपने गांव की ओर चल दिए। गणेश को दिल्ली से बिहार आने के लिए सीधे बस नहीं मिली, तो उसने गोरखपुर के लिए बस ली और किसी तरह गोरखपुर पहुंचे और फिर वहां से गोपालगंज आ गए। वे मायूस होकर एक ही स्वर में कहते हैं, जब दिल्ली से यहां तक पहुंच गए, तो कटिहार भी किसी तरह पहुंच ही जाएंगें। आखिर हमलोगों की नियति ही यही है। फिर काम की तलाश में तो अन्य प्रदेश जाना ही न होगा। कब तक यहां रहेंगे। दिल्ली, मुंबई , गुजरात, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में कोरोना के संक्रमण की रफ्तार और पिछले साल की स्थिति को याद कर लोग आशंकित हैं। बिहार के प्रवासी शहरों को छोड़ने लगे हैं। ट्रेनों में कंफर्म टिकट नहीं है। बसो और ऑटो से लोग वापस अपने गांव लौट रहे हैं। गोपालगंज के कुचायकोट के रहने वाले रामनिवास सिंह कहते हैं कि दूसरे राज्यों में कमाने गए लोगों को लगने लगा है कि अगर फंस गए तो सड़क पर आ जाएंगे। कंपनी मालिक ने तो साथ छोड़ ही दिया है, सरकार भी कहीं का नहीं छोड़ेगी। रामनिवास भी दे दिन पहले ही गुजरात से वापस लौटे हैं। वे कहते हैं, सिनेमाहाल, माल और बाजार बंद होने के बाद कल-कारखाने लगभग बंद हो गए हैं। ऐसे में किराया नहीं मिलने पर कामगार अपना सामान गिरवी रखकर या उधार लेकर घर के तरफ चल दिए हैं। सीवान के महराजगंज के रहने वाले युवकों का एक जत्था भी महाराष्ट्र से यहां वापस आया है। ये सभी पेंटर हैं, जो मुंबई स्थित एक कंपनी के माध्यम से वहां काम करते थे। ये कई दिनों से टिकट कंफर्म के लिए परेशान थे, लेकिन जब इन्हें एक विशेष ट्रेन नजर आई तो वे उसी पर सवार होकर किसी तरह बिहार पहुंच गए। उन्होंने कहा कि उधार पैसा लेकर वहां से किसी तरह यहां पहुंच गए हैं। उन्होंने बताया कि कई लोग महाराष्ट्र से वापस बिहार आने के लिए परेशान है। कहीं कोई उपाय नहीं दिख रहा है। कई कंपनी के मालिक तो भाग गए हैं, जिससे परेशानी बढ गई है। इस जत्थे में शामिल रूपेश कहता है कि एक सीट पर तीन से चार लोग बैठकर यहां पहुंचे हैं। इधर, प्रवासियों का आने का सिलसिला जारी है। जिसे जो साधन मिल रहा है अपने गांवों तक पहुंचने के लिए प्रयोग कर रहा है। ऐसे में अपने गांव पहुंचने का सुकून है लेकिन कोरोना के भय से भयभीत और आने वाले दिनों की चिंता ऐसे लोगों को सताए जा रही है। –आईएएनएस एमएनपी/आरजेएस

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