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भोपाल की जामा मस्जिद और 11वीं सदी के भोजशाला स्मारक पर मंडरा रहा संकट

भोपाल, 21 मई (आईएएनएस)। उत्तर भारत के दो पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से एक ही तरह की सुर्खियां बन रही हैं। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में जहां ज्ञानवापी मस्जिद मामले पर अदालत के अंदर और बाहर जमकर बहस चल रही है, वहीं मध्य प्रदेश में मंदिर बनाम मस्जिद का एक समान मुद्दा भोपाल के चौक बाजार इलाके में स्थित 19वीं सदी की जामा मस्जिद के आसपास का एक ताजा उदाहरण है। एक दक्षिणपंथी संगठन, संस्कृति बचाओ मंच ने दावा किया है कि पुराने भोपाल के चौक बाजार इलाके में स्थित जामा मस्जिद 19वीं शताब्दी में एक शिव मंदिर की जगह पर बनाई गई थी। गुरुवार को दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं के एक समूह ने राज्य के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से मुलाकात की और इस मामले की ओर राज्य सरकार का ध्यान आकर्षित किए जाने के बाद इस मुद्दे को गति मिली है। चंद्रशेखर तिवारी की अध्यक्षता में संस्कृति बचाओ मंच ने जामा मस्जिद के विस्तृत सर्वेक्षण की मांग को लेकर एक ज्ञापन सौंपा। तिवारी ने कहा कि वह आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर स्थानीय अदालत में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। गुरुवार को मिश्रा से मुलाकात के बाद तिवारी ने संवाददाताओं से कहा, हमने राज्य सरकार से जामा मस्जिद के विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग की है। हम अदालत में एक याचिका भी दायर करेंगे, जिसमें सभा मंडप नामक मंदिर के ऊपर बनी मस्जिद के इतिहास को उजागर करने के लिए सर्वेक्षण और खुदाई की मांग की जाएगी। चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि उन्होंने हयाते-ए-कुदसी (भोपाल की पहली महिला शासक नवाब कुदसिया बेगम पर लिखी गई पुस्तक) में एकत्रित तथ्यों के आधार पर सर्वेक्षण की मांग उठाई है। बेगम (1819-1832) ने भोपाल में जामा मस्जिद और गोहर महल पैलेस का निर्माण कराया था। तिवारी ने दावा करते हुए कहा, अपने जीवन पर लिखी किताब में, नवाब कुदसिया बेगम ने उल्लेख किया है कि भोपाल में जामा मस्जिद के निर्माण का काम 1832 में शुरू हुआ और 1857 में पूरा हुआ। यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि मस्जिद उसी जमीन पर बनाई गई थी, जहां सभा मंडप के नाम से जाना जाने वाला एक हिंदू मंदिर पहले से मौजूद था इस मुद्दे को हिंदू धर्म सेना नामक एक अन्य दक्षिणपंथी संगठन ने भी उठाया है। हालांकि, मध्य प्रदेश में यह एकमात्र मंदिर बनाम मस्जिद विवाद नहीं है, जिस पर इन दिनों बहस हो रही है। इस महीने की शुरुआत में, हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस नामक एक संगठन ने उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर दावा किया था कि धार जिले में स्थित भोजशाला स्मारक हिंदू समुदाय का है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के 2003 के उस आदेश को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें हिंदुओं पर प्रतिदिन भोजशाला में पूजा करने पर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद इंदौर पीठ ने एएसआई, केंद्र और मप्र सरकार को नोटिस जारी कर मामले पर जवाब मांगा। भोजशाला एक एएसआई संरक्षित 11वीं सदी का स्मारक है, जिसके बारे में हिंदुओं का दावा है कि यह वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमल मौला मस्जिद के रूप में मानता है। एएसआई द्वारा 7 अप्रैल 2003 को की गई व्यवस्था के अनुसार, हिंदू समुदाय के लोग प्रत्येक मंगलवार को परिसर में पूजा करते हैं, जबकि मुसलमान शुक्रवार को परिसर में नमाज अदा करते हैं। याचिका में दावा किया गया है, केवल हिंदू समुदाय के सदस्यों को ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सरस्वती सदन के परिसर के भीतर देवी वाग्देवी के स्थान पर पूजा और अनुष्ठान करने का मौलिक अधिकार है, जिसे आमतौर पर धार में स्थित भोजशाला के रूप में जाना जाता है। याचिका के अनुसार, मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को उपरोक्त संपत्ति के किसी भी हिस्से का किसी भी धार्मिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी आग्रह किया कि वह केंद्र को लंदन स्थित संग्रहालय से देवी सरस्वती की मूर्ति को वापस लाने और भोजशाला परिसर के भीतर इसे फिर से स्थापित करने का निर्देश दे। याचिका में उल्लेख किया गया है कि धार के तत्कालीन शासकों ने 1034 ईस्वी में भोजशाला में पवित्र मूर्ति स्थापित की थी और इसे 1857 में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाया गया था। याचिकाकर्ताओं में से एक, आशीष गोयल ने कहा, हमने अब अपने धार्मिक स्थान को पुन: प्राप्त करने के लिए कानूनी रूप से लड़ना शुरू कर दिया है। अदालत ने हमारी याचिका को व्यापक मानते हुए नोटिस जारी किया है। –आईएएनएस एकेके/एएनएम

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