नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मंगलवार शाम बीजेपी के भीतर सियासी सरगर्मी तेज हो गई, जब सहभोज के बहाने पार्टी के करीब 40 ब्राह्मण विधायक और एमएलसी एक ही जगह जुट गए। यह सहभोज कुशीनगर से बीजेपी विधायक पीएन पाठक के सरकारी आवास पर आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम के बाद से प्रदेश की राजनीति में कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
सहभोज के नाम पर बड़ी बैठक
हालांकि इस आयोजन को औपचारिक तौर पर सहभोज बताया गया, लेकिन इसके जरिए बड़ी संख्या में ब्राह्मण विधायकों का एकजुट होना सत्ताधारी पार्टी के लिए चौंकाने वाला रहा। जानकारी के मुताबिक, कार्यक्रम के दौरान विधायकों को लिट्टी-चोखा और मंगलवार व्रत का फलाहार परोसा गया। सूत्रों का कहना है कि सहभोज के दौरान कुछ अहम राजनीतिक और संगठनात्मक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। इस बैठक में नृपेन्द्र मिश्र के बेटे और एमएलसी साकेत मिश्र की मौजूदगी ने सियासी चर्चाओं को और हवा दे दी है।
पहले ठाकुर, अब ब्राह्मण विधायक एकजुट
यह पहला मौका नहीं है जब बीजेपी के भीतर इस तरह की हलचल देखने को मिली हो। इससे पहले मानसून सत्र के दौरान ठाकुर विधायकों की एकजुटता सामने आई थी। अब ब्राह्मण विधायकों के इस सहभोज को पार्टी के अंदर चल रहे असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है। सियासी जानकार मानते हैं कि यह अंदरखाने पक रही राजनीतिक खिचड़ी का संकेत हो सकता है, जो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए चुनौती बन सकती है।
कौन-कौन विधायक रहे मौजूद
पीएन पाठक के आवास पर हुए सहभोज में कई बड़े चेहरे शामिल रहे। इनमें विधायक रत्नाकर मिश्र, प्रकाश द्विवेदी, रमेश मिश्र, शलभमणि त्रिपाठी, विपुल दूबे, राकेश गोस्वामी, रवि शर्मा, विनोद चतुर्वेदी, संजय शर्मा, विवेकानंद पाण्डेय, अनिल त्रिपाठी, अंकुर राज तिवारी और साकेत मिश्र शामिल हैं। इसके अलावा उमेश द्विवेदी (एमएलसी), बाबूलाल तिवारी (एमएलसी), विनय द्विवेदी, सुभाष त्रिपाठी, अनिल पाराशर, कैलाशनाथ शुक्ला, प्रेमनारायण पाण्डेय, ज्ञान तिवारी, सुनील दत्त द्विवेदी और धर्मेंद्र सिंह भूमिहार (एमएलसी) भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे।
बीजेपी के लिए बढ़ी चुनौती
पहले ठाकुर और अब ब्राह्मण विधायकों के अलग-अलग रूप में एकजुट होने से बीजेपी के अंदर जातीय संतुलन और संगठनात्मक असंतोष की तस्वीर साफ दिखने लगी है। यह स्थिति मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी आलाकमान के लिए चिंता का विषय बन सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि 2027 से पहले पार्टी इन अंदरूनी असंतोषों को संभालने में सफल नहीं हुई, तो इसका असर आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है।





