नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड आंदोलन के प्रणेता शिबू सोरेन का सोमवार सुबह दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की खबर से पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। शिबू सोरेन के सम्मान में झारखंड सरकार ने राज्यभर में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है।
राज्य सरकार ने किया तीन दिन का राजकीय शोक घोषित
शिबू सोरेन के सम्मान में झारखंड सरकार ने राज्यभर में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। इस दौरान सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा, कोई सरकारी समारोह आयोजित नहीं होगा, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में श्रद्धांजलि सभाएं होंगी।
राजनीतिक शुरुआत: बरलंगा पंचायत से मिली पहली हार
शिबू सोरेन ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत बरलंगा पंचायत से मुखिया पद का चुनाव लड़कर की थी। हालांकि वे मामूली अंतर से यह चुनाव हार गए। कहा जाता है कि इस चुनाव में महाजनों ने उनके खिलाफ चाल चली थी। इसी घटना के बाद उन्होंने महाजनों के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया और ग्रामीणों की जमीन वापस दिलवाने का आंदोलन शुरू किया। साल 1972 में शिबू सोरेन ने शिवचरण मांझी नाम से झारखंड पार्टी के बैनर पर जरीडीह विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्हें जनसंघ के छत्रु महतो से हार का सामना करना पड़ा।
टुंडी चुनाव में तीसरी हार और नया रास्ता
साल 1977 में टुंडी से तीसरी बार चुनाव लड़ा, लेकिन जनता पार्टी के सत्य नारायण दुदानी से हार गए। उस समय झामुमो का पंजीकरण नहीं हुआ था, इसलिए उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा। इस चुनाव में वोटों का बंटवारा भी उनकी हार का एक कारण बना, क्योंकि झामुमो के ही एक अन्य नेता शक्ति नाथ महतो भी मैदान में थे। टुंडी की हार के बाद शिबू सोरेन ने संथाल परगना को अपना राजनीतिक केंद्र बनाया। एक बार धनबाद के पास महाजनों ने उनकी जान लेने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने उफनती बराकर नदी में बाइक समेत छलांग लगाकर जान बचाई। इस घटना ने उन्हें संथाल में हीरो बना दिया। लोगों ने उन्हें ‘गुरुजी’ कहकर सम्मानित किया और यहीं से उनकी जीत की शुरुआत हुई।
महाजनों के खिलाफ आंदोलन ने बनाया जननायक
शिबू सोरेन ने महाजनों की सूदखोरी और शराब के खिलाफ आंदोलन चलाकर गरीब आदिवासियों में अपनी गहरी पहचान बनाई। उनका ‘धनकटनी आंदोलन’ बेहद प्रसिद्ध हुआ, जिसमें महाजनों द्वारा कब्जा की गई जमीन पर धान की फसल कटवाकर ग्रामीणों में बांटी जाती थी। शिबू सोरेन का जीवन पूरी तरह संघर्ष से भरा रहा। भले ही शुरुआती चुनावी हारों ने उन्हें निराश किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और आदिवासी हितों की लड़ाई को अपनी जिंदगी बना लिया। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री और कई बार केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे।




