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Monday, March 2, 2026
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बाबा के दरबार में भी टिकट? महाकाल मंदिर की आरती पर ₹250 शुल्क से मचा बवाल, सड़क पर उतरे श्रद्धालु

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में संध्या और शयन आरती के लिए 250 रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क लागू किए जाने के फैसले के खिलाफ श्रद्धालु और हिंदू संगठन विरोध कर रहे हैं।

नई दिल्ली/रफ्तार डेेेस्क । उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में संध्या और शयन आरती के लिए प्रति व्यक्ति 250 रुपये शुल्क लागू किए जाने के फैसले के बाद विरोध तेज हो गया है। मंदिर प्रबंधन द्वारा आरती की बुकिंग प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन करने और निर्धारित शुल्क लेने के निर्णय को लेकर श्रद्धालुओं और कई हिंदू संगठनों ने आपत्ति जताई है। विरोध कर रहे लोगों का सवाल है क्या अब बाबा के दरबार में भी जाने के लिए टिकट लगेगा?

मंदिर प्रबंध समिति ने किया ये दावा

मंदिर प्रबंध समिति का कहना है कि यह कदम दर्शन व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित, पारदर्शी और डिजिटल बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। समिति के अनुसार, अब श्रद्धालु आधिकारिक वेबसाइट के जरिए घर बैठे आरती में शामिल होने के लिए स्लॉट बुक कर सकेंगे। संध्या आरती की ऑनलाइन बुकिंग प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से और शयन आरती की बुकिंग शाम 4 बजे से शुरू होगी। दोनों आरतियों के लिए 250 रुपएं प्रति श्रद्धालु शुल्क तय किया गया है और बुकिंग ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर होगी। प्रबंधन का दावा है कि इससे भीड़ नियंत्रण और व्यवस्था बनाए रखने में मदद मिलेगी।

”आस्था से जुड़े आयोजन पर शुल्क लगाना अनुचित”

हालांकि, इस फैसले के खिलाफ धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। कुछ संगठनों ने इसे जजिया कर जैसा बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि आस्था से जुड़े आयोजन पर शुल्क लगाना अनुचित है और इससे गरीब श्रद्धालु प्रभावित होंगे।

मामले ने सियासी रंग लिया

मामले ने सियासी रंग भी ले लिया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे संवेदनशील मुद्दा बताते हुए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आरती के लिए शुल्क लेना शर्म की बात है और इससे आम श्रद्धालुओं पर आर्थिक बोझ पड़ेगा। वहीं राज्य सरकार की ओर से भी प्रतिक्रिया आई है। सरकार में शामिल एक मंत्री ने संकेत दिए हैं कि वे मंदिर प्रबंधन से चर्चा कर शुल्क पर पुनर्विचार की मांग करेंगे।

मामला धार्मिक आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था का

फिलहाल, मामला धार्मिक आस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीति तीनों के बीच चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब देखना होगा कि बढ़ते विरोध के बीच मंदिर प्रबंधन अपने फैसले पर कायम रहता है या इसमें बदलाव किया जाता है।

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