नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। राज्य सरकार ने उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का फैसला ले लिया है। यह व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से लागू होगी। इसके तहत अब राज्य के मदरसों को धार्मिक शिक्षा देने के लिए नए प्राधिकरण से मान्यता लेनी होगी। राज्यपाल ने इस आशय वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है। जिसमें राज्य सरकार का कहना है कि,इस कदम का उद्देश्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की कसौटी पर खरा उतारना है। वहीं, विपक्ष ने सरकार के इस कदम पर सवाल उठाए हैं।
अब कैसे मिलेगी मान्यता? जानें नई व्यवस्था
नए कानून के तहत, 2026-27 शैक्षणिक सत्र से धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले सभी मदरसों को राज्य सरकार द्वारा गठित प्राधिकरण से मान्यता लेना अनिवार्य होगा। यह मान्यता तीन वर्षों के लिए वैध होगी, जिसके बाद नवीनीकरण करवाना अनिवार्य होगा।इस कदम का मकसद शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना है, लेकिन राजनीतिक मतभेद जारी हैं।
मान्यता के लिए ये शर्तें होंगी जरूरी
संस्थान की भूमि उसकी प्रबंध समिति के नाम पर पंजीकृत होनी चाहिए
सभी वित्तीय लेन-देन किसी कमर्शियल बैंक खाते के माध्यम से ही होंगे
शिक्षा केवल उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम 2016 और अरबी-फारसी मान्यता नियमावली 2019 के तहत दी जा सकेगी।
1 जुलाई 2026 से होगा मदरसा बोर्ड समाप्त
राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड मदरसा बोर्ड को विधिवत समाप्त कर दिया जाएगा। इसके बाद सभी मदरसों को अपनी मान्यता नए कानून के तहत ही लेनी होगी। राज्य में इस समय दर्जनों मदरसे उत्तराखंड मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं, जिन्हें अब अपने दस्तावेज़ और प्रक्रिया नए नियमों के अनुरूप अपडेट करनी होगी। इसे लेकर राजनीति भी गरमाई है जहां नेताओं के तीखे बयान सामने आए है।
नए कानून को लेकर प्रदेश की सियासत भी गर्म हो गई है
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, यह कदम अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए उठाया गया है। अब मदरसों में पारदर्शिता और शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित होगी। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, मदरसा बोर्ड को खत्म करना शिक्षा के आधुनिकीकरण को बाधित करेगा। यह फैसला अल्पसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने वाला है।
उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा को लेकर लाया गया यह कानून निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक बदलाव है। सरकार जहां इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार का जरिया मान रही है, वहीं विरोधी दल इसे अल्पसंख्यकों की उपेक्षा बता रहे हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले वर्षों में यह कदम राज्य की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति को किस दिशा में ले जाता है।




