नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद की उपभोक्ता अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसले में सिस्टम की लापरवाही को कठघरे में खड़ा कर दिया। साल 2018 में छात्रा समृद्धि ने रेलवे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी कि समय पर टिकट होने के बावजूद ट्रेन ढाई घंटे से ज्यादा लेट हो गई, जिसके कारण वह नीट जैसी अहम परीक्षा में शामिल नहीं हो सकी। सालों की मेहनत एक झटके में बेकार हो गई। मानसिक पीड़ा और भविष्य को हुए नुकसान को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने रेलवे को दोषी ठहराया और 7 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 9 लाख 10 हजार रुपये का भारी जुर्माना लगाया।
देरी पर भी सख्ती: ब्याज सहित भुगतान का आदेश
कोर्ट ने जुर्माने के साथ रेलवे को कड़ा संदेश देते हुए साफ कहा कि अगर हर्जाने की राशि देने में जरा भी देरी की गई, तो रेलवे को पूरी रकम पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज अलग से देना होगा। इस आदेश के बाद रेल प्रशासन में हड़कंप मच गया है, क्योंकि अब मामला सिर्फ जुर्माने तक सीमित नहीं रहा।
क्या है पूरा मामला?
कोतवाली थाना क्षेत्र के पिकौरा बक्स मोहल्ले की रहने वाली छात्रा समृद्धि नीट परीक्षा की तैयारी कर रही थी। उसने परीक्षा फॉर्म भरते समय लखनऊ के जयनारायण पीजी कॉलेज को परीक्षा केंद्र चुना था। परीक्षा के दिन वह बस्ती से इंटरसिटी सुपरफास्ट ट्रेन से रवाना हुई, जिसे सुबह 11 बजे लखनऊ पहुंचना था, जबकि परीक्षा केंद्र पर 12:30 बजे तक पहुंचना अनिवार्य था।
ढाई घंटे की लेटलतीफी: छूट गई परीक्षा
दुर्भाग्यवश ट्रेन निर्धारित समय से ढाई घंटे देरी से पहुंची। इस कारण समृद्धि परीक्षा केंद्र समय पर नहीं पहुंच सकी और उसका नीट का पेपर छूट गया। एक ट्रेन की देरी ने छात्रा के सालों की मेहनत और भविष्य की दिशा बदल दी।
न्याय की लड़ाई: उपभोक्ता आयोग की शरण
घटना से आहत समृद्धि ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष न्यायाधीश अमरजीत वर्मा और सदस्य अजय प्रकाश सिंह ने रेलवे की लापरवाही को गंभीर माना और छात्रा के पक्ष में फैसला सुनाया।
2018 से शुरू हुआ संघर्ष: वकील का बयान
समृद्धि के वकील प्रभाकर मिश्रा ने बताया कि 7 मई 2018 को नीट परीक्षा देने जाते समय ट्रेन की लेटलतीफी के कारण छात्रा परीक्षा से वंचित रह गई और उसका पूरा साल बर्बाद हो गया। उन्होंने रेलवे मंत्रालय, महाप्रबंधक और स्टेशन अधीक्षक को नोटिस भेजा, लेकिन जवाब न मिलने पर 11 सितंबर 2018 को उपभोक्ता आयोग में मुकदमा दायर किया गया।
7 साल लंबी सुनवाई: रेलवे ने मानी खामी
करीब 7 साल तक चले मुकदमे में आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। रेलवे ने ट्रेन की देरी को स्वीकार तो किया, लेकिन इसका कोई ठोस कारण नहीं बता सका, जिसे कोर्ट ने गंभीर लापरवाही माना।
45 दिन का अल्टीमेटम
अंततः कोर्ट ने रेलवे को 45 दिनों के भीतर 9 लाख 10 हजार रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। साथ ही चेतावनी दी कि तय समय सीमा में राशि न देने पर पूरी रकम पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह फैसला न केवल समृद्धि के लिए न्याय की जीत है, बल्कि यात्रियों के अधिकारों के लिए भी एक बड़ी मिसाल बन गया है।




