नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क । उत्तर प्रदेश के दादरी के बिसहाड़ा गांव में 10 साल पहले हुए अखलाक हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। अब यूपी सरकार आरोपियों से यह केस वापस लेने की योजना बना रही है। गोहत्या के संदेह में अखलाक की निर्मम हत्या कर दी गई थी, जो उस समय व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस का कारण बनी थी।
इस घटना ने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि केंद्र की राजनीति में भी भूचाल मचा दिया था। अखलाक की हत्या को देशभर में मॉब लिंचिंग की एक पहली बड़ी घटना माना गया, और यह आज भी ऐसी वारदातों के संदर्भ में याद की जाती है। इस घटना ने साम्प्रदायिक तनाव और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
मामले में अभियोजन वापसी की मंजूरी
अखलाक हत्याकांड में उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी आरोपियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सूबे के विशेष सचिव मुकेश कुमार सिंह-II ने गौतमबुद्धनगर के डीएम को एक पत्र भेजकर अभियोजन वापसी की मंजूरी दी। इस पत्र में कहा गया है कि शासन को मिली रिपोर्ट और कानूनी तर्कों पर विचार करने के बाद यह निर्णय लिया गया। अतिरिक्त जिला सरकारी वकील भाग सिंह भाटी ने भी इस निर्णय की पुष्टि की है। सरकार की मंजूरी के बाद अब केस बंद होने का रास्ता औपचारिक रूप से खोल दिया गया है।
CRPC की धारा 321 के तहत आवेदन
शासन द्वारा भेजे गए पत्र में कहा गया है कि डीएम की संस्तुति और न्यायालय में प्रस्तुत प्रार्थना पत्र के आधार पर अभियोजन समाप्त करने की अनुमति दी जाती है। साथ ही, यह निर्देश दिया गया है कि डीएम सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मुकदमा वापसी की कानूनी प्रक्रिया पूरी कराएं। इसके बाद सरकारी वकील कोर्ट में औपचारिक आवेदन पेश करेंगे, जिसके बाद अदालत मामले की आगे की कार्यवाही तय करेगी। यह कदम इस बहुचर्चित केस के न्यायिक भविष्य पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
कैसे कर दी गई अखलाक की हत्या
28 सितंबर 2015 की रात, बिसहाड़ा गांव में लाउडस्पीकर के माध्यम से घोषणा की गई कि अखलाक ने गोहत्या की है और उसका मांस घर में रखा है। इसके बाद एक हिंसक भीड़ ने उनके घर पर हमला कर दिया। इस हमले में अखलाक की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, जबकि उनका बेटा दानिश गंभीर रूप से घायल हो गया।
देशभर में मॉब लिंचिंग पर गहरी बहस को जन्म दिया
अखलाक की पत्नी इकरामन ने उसी रात जारचा थाने में 10 नामजद और 4-5 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इस घटना ने देशभर में मॉब लिंचिंग पर गहरी बहस को जन्म दिया और यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन गया।
गवाहों के बयानों में बदलाव और चार्जशीट
जांच के दौरान पुलिस ने अखलाक की पत्नी इकरामन, मां असगरी, बेटी शाहिस्ता और बेटे दानिश के बयान दर्ज किए। शुरूआत में 10 आरोपियों के नाम सामने आए, लेकिन बाद में गवाहों ने 16 और नाम जोड़ दिए। विवेचक ने 22 दिसंबर 2015 को 18 आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया, जिनमें दो नाबालिग भी शामिल थे।
बाकी सभी आरोपी जमानत पर बाहर
वर्तमान में, एक आरोपी की मौत हो चुकी है और बाकी सभी आरोपी जमानत पर बाहर हैं। इस मामले में गवाहों के बयान बदलने का मुद्दा अब अभियोजन वापसी के तर्कों में शामिल किया गया है, जो सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
घटनास्थल से मिले मांस के नमूने को मथुरा की फॉरेंसिक लैब में जांच के लिए भेजा गया, जिसमें 30 मार्च 2017 को रिपोर्ट आई कि मांस गोवंशीय था। न्यायालय में पेश दस्तावेजों में चश्मदीद गवाहों के बयानों में आरोपियों की संख्या में बदलाव और दोनों पक्षों के बीच पूर्व रंजिश न होने का उल्लेख है, जिन्हें अभियोजन वापसी के आधार में जोड़ा गया है।
सरकार ने मुकदमा वापस लेने की अर्जी दाखिल की
गौतमबुद्धनगर की त्वरित न्यायालय (प्रथम) में सरकार ने मुकदमा वापस लेने की अर्जी दाखिल की है। सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) ने कोर्ट को बताया कि सामाजिक सद्भाव की बहाली को ध्यान में रखते हुए सरकार अभियोजन समाप्त करना चाहती है। उन्होंने शासनादेश और राज्यपाल की अनुमति का हवाला देते हुए कहा कि अब अदालत ही तय करेगी कि आगे क्या कदम उठाया जाए।
पीड़ित परिवार के वकील ने क्या कहा
अखलाक परिवार के वकील युसूफ सैफी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सरकार धारा 321 के तहत अर्जी डाल सकती है, लेकिन अंतिम फैसला कोर्ट का होगा। उन्होंने कहा कि यह मॉब लिंचिंग और हत्या का मामला है, जिसमें गवाहों, साक्ष्यों और गवाही की अहमियत है। बेटी शाहिस्ता के बयान हो चुके हैं, दानिश चश्मदीद है, और केस वर्तमान में साक्ष्य चरण में है, ऐसे में केस वापसी की कोशिश न्याय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सरकार क्यों लेना चाहती है केस वापस?
अतिरिक्त जिला सरकारी वकील भाग सिंह भाटी ने पहले बताया था कि सरकार ने रिपोर्टों और प्रस्तुत तर्कों को ध्यान में रखते हुए केस वापसी का फैसला लिया है, लेकिन अब वे इस पर मीडिया से बात नहीं कर रहे हैं। चूंकि यह मामला राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक संवेदनशीलता से जुड़ा है, मुकदमा वापसी पर सवाल उठ रहे हैं। अब सभी की नजर कोर्ट पर है, जो यह तय करेगा कि अखलाक हत्याकांड पर मुकदमा जारी रहेगा या नहीं।





