नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ में आज मौनी अमावस्या पर मची भगदड़ ने 71 साल पहले हुए हादसे की याद ताजा कर दी है। साल 1954 के कुंभ मेले में भी मौनी अमावस्या के दिन ही भगदड़ मची थी। तब करीब 500 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मेले में कुछ प्रतिबंध लागू किए थे, जिन्हें अब भी लागू किया जाता है।
आजादी के बाद पहला कुंभ मेला था
भारत में कुंभ मेले की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन 1954 में प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में आयोजित कुंभ मेला भारत की आज़ादी के बाद का पहला कुंभ था। इसका संचालन सरकार के नियंत्रण में किया गया था। इस मेले में 3 फरवरी 1954 यानी मौनी अमावस्या के दिन भगदड़ मच गई थी। जिसमें 500 श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी।
हाथी के बेकाबू होने पर मची थी भगदड़
रिपोर्ट के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान के लिए कुंभ पहुंचे थे। तब स्नान चल ही रहा था कि एक हाथी नियंत्रण से बाहर हो गया और भीड़ को कुचलता चला गया। तब भगदड़ भी मच गई थी। इस दुर्घटना में करीब 500 लोग मारे गए थे। तब भगदड़ को नियंत्रित करने और सूचना देने के लिए सिर्फ लाउडस्पीकर्स की सहायता ली गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस घटना के बाद से कुंभ मेले में हाथियों के उपयोग पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया था।
वीआईपी एंट्री पर पाबंदी
हाथी की घटना और भीड़ की असामान्य स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने एक और बड़ा निर्णय लिया था।कुंभ के मुख्य स्नान पर्वों के दौरान वीआईपी की एंट्री पर रोक लगाने का आदेश था। ये प्रतिबंध आज भी कुंभ, अर्द्धकुंभ और महाकुंभ में लागू किए जाते हैं।





