प्रयागराज, 18 मार्च (हि.स.)। पारि-पुनर्स्थापन वन अनुसंधान केन्द्र द्वारा अल्प ज्ञात पौधों के संरक्षण, प्रबंधन व सतत उपयोग विषय पर दो दिवसीय ऑनलाइन अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ गुरूवार को किया गया। केन्द्र प्रमुख डॉ. संजय सिंह ने प्रतिभागियों को संगोष्ठी की विषयवस्तु से अवगत कराया और वैश्विक स्तर पर इन पौधों के संरक्षण, प्रबंधन तथा महत्व पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर डॉ. एस.डी शर्मा भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद देहरादून ने अनुसंधान की आवश्यकता तथा प्रसार पर जोर दिया। पुत्रा विश्वविद्यालय, मलेशिया के वानिकी, जैव विविधता एवं पर्यावरण संकाय के प्रो.डॉ. नजरे सल्लाह ने मलेशिया की विलुप्त हो रही पादप प्रजातियों के प्रबंधन हेतु विचार प्रस्तुत किया। पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक, तमिलनाडु वन प्रमण्डल डॉ.राजीव श्रीवास्तव ने पौधों की विलुप्त प्रजातियों के संरक्षण एवं पारिस्थितिक सुरक्षा पर चर्चा की। प्रो.सास बिस्वास प्रभागाध्यक्ष वानिकी, डॉल्फिन जैव चिकित्सा एवं प्राकृतिक विज्ञान संस्थान तथा डॉ.संध्या गोस्वामी, एसो. प्रोफेसर ने संरक्षण एवं प्रबंधन नीतियों के विकास पर प्रकाश डाला। माहेश्वर हेगडे, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभागाध्यक्ष जोधपुर ने रेगिस्तान के एक बहुउद्देशीय अल्प ज्ञात प्रजाति खैर के सुधार एवं प्रबंधन पर चर्चा किया। वन विज्ञान एवं वन प्रबंधन विभाग हिमाचल प्रदेश वैज्ञानिक डॉ. पीएस नेगी ने पश्चिमी हिमालय की विलुप्त पादप प्रजातियों के भण्डारण विधियों एवं स्थितियों के प्रभाव पर प्रस्तुतीकरण किया। डॉ. वनीत जिश्तु, वैज्ञानिक हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान ने भारत के उत्तर-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के अध्ययन द्वारा अल्प ज्ञात पौधों के सतत विकास लक्ष्यों में योगदान के लिए पश्चिमी हिमालय क्षेत्र की भूमिका से अवगत कराया। प्रो. बबिता कुमारी, जैव प्रौद्योगिकी प्रभाग खोरधा, ओडिसा ने एमरेंथस तथा ब्रायोफाइलम जैसे आर्थिक पौधों की पत्तियों में मुक्त अमीनो एसिड पर गर्मी के प्रभाव पर किये गये अध्ययन पर प्रकाश डाला। प्रो. मोहन कान्त गौतम अध्यक्ष पश्चिम व पूर्वी यूरोपीय विश्वविद्यालय नीदरलैण्ड ने यूरोपीय तथा हिन्दुस्तानी पारम्परिक औषधीय पौधों की प्रणाली पर बताया कि यूरोपियन पारम्परिक पौधों के प्रवर्धन पद्धति में अनुसंधान की आवश्यकता है, जिससे पारम्परिक औषधीय पौधों के प्रवर्धन प्रणाली को आधुनिक विधि द्वारा विस्थापित किया जा सके। अन्त में वर्षा वन अनुसंधान संस्थान जोरहाट की अंकुर ज्योति साक्या तथा वन अनुसंधान संस्थान देहरादून की राधिका खन्ना ने अपने अनुभव साझा किये। कार्यक्रम में देश-विदेश के लगभग 150 वैज्ञानिक, अनुसंधान कर्ताओं ने ऑनलाइन माध्यम से भाग लिया। हिन्दुस्थान समाचार/विद्या कान्त




