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मिसाल बना संत का जीवन, पर्यावरण को बचाने में समर्पित किया पूरा जीवन

रजनीश पाण्डेय रायबरेली, 04 जून(हि.स.)। पर्यावरण हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है, इससे नकार कर हम जीवन की कल्पना नहीं कर सकते हैं। पर्यावरण को बचाये रखने की सरकारें जहां अपने प्रयास में लगी हैं वही समाज में कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने इसे अपने जीवन में अपना लिया है। इनके लिए यह कोई औपचारिकता नहीं है बल्कि अब जीवन का लक्ष्य बन चुका है। किसी एक विशेष दिन इनके लिए महत्व नहीं रखता बल्कि पेड़ पौधों और गंगा को बचाना इनके रोज़ाना के कामों में शुमार हो चुका है। प्रचार-प्रसार से दूर अपने सीमित संसाधनों में ये सब पर्यावरण संरक्षण के प्रति स्वयं समर्पित किया है और दूसरों के लिये प्रेरणास्रोत बने हैं।जानिये इनकी पूरी कहानी। आश्रम छोड़ गंगा को निर्मल बनाने में जुटे 'संत' साधू-संतों को लोगों ने आश्रमों में प्रवचन करते और धार्मिक कर्मकांड कराते ही देखा है।बावजूद इसके कई ऐसे संत महात्मा हैं जिन्होंने धर्म को कर्म से जोड़ा और लोगों को आचरण में उतारने को प्रेरित किया है। रायबरेली के डलमऊ के बड़ा मठ के महंत स्वामी देवेंद्रनन्द गिरी केवल अपने आश्रम तक सीमित नहीं हैं। चार साल पहले शुरू की गई उनकी मुहिम अब रंग ला रही है और हजारों लोग इससे जुड़ चुके हैं। स्वामी देवेंद्रनन्द गिरी ने डलमऊ के गंगा घाटों पर फैली गंदगी को हटाने, गंगा में शवों को फेंकने से रोकने और आसपास पौधरोपण की मुहिम चार साल पहले कुछ लोगों के साथ शुरू की। जिसमें गंगा घाटों को स्वच्छ रखने के लिए साप्ताहिक अभियान चलाया जाता है। शवों को लोग गंगा में न प्रवाहित करें इसके लिए आश्रम के लोग निरंतर सक्रिय रहते हैं। महंत देवेंद्रनन्द गिरी के प्रयास से आसपास के गावों में हजारों पौधों का रोपण किया जा चुका है। इन प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि डलमऊ के गंगा घाट साफ़ और स्वच्छ है।हजारों लोग इससे जुड़कर गंगा को निर्मल बनाने में जुटे हैं। बड़ा मठ के सचिव दिव्यानन्द गिरी के अनुसार पर्यावरण को संरक्षित करने का यह अभियान अब एक आंदोलन का रूप ले चुका है और लोग प्रेरित होकर स्वयं इससे जुड़ रहे हैं। गांव-गांव तैयार हो रही है 'पंचवटी' कोरोना काल में सबसे ज्यादा जरूरत ऑक्सीजन की महसूस हुई। भारतीय संस्कृति में महत्व रखने वाले इन ऑक्सीजन के प्राकृतिक स्रोतों की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया,लेकिन एक प्रोफ़ेसर ने इन्हें बचाने और बढ़ाने का संकल्प लिया और आज वह गांव गांव आकार ले रहा है। कॉलेज से सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर डॉ महादेव सिंह गावों में जाकर विलुप्त हो रही पंचवटी(जिसमें बरगद,पीपल,बेल,अशोक,पाकड़,जामुन आदि आते हैं) का रोपण करते हैं। उल्लेखनीय है कि यह सब वह ख़ुद के पैसों से करते हैं और यह उनके नित्यकर्म में शामिल हो चुका है। उनके इस काम में प्रेम नारायण तिवारी और राम नारायण सविता भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। अब तक कई गावों में सैकड़ों पंचवटी लगा चुके हैं। वृक्ष ही हमारे जीवन के आधार हैं और नई पीढ़ी को इसे समझना है। पेड़ पौधों के प्रति लगाव ने बना दिया 'साधू' करीब 80 वर्षीय श्याम मिश्रा का अपना परिवार है लेकिन अब वह सबके लिए साधू हैं और लोग अब उन्हें इसी नाम से जानते हैं, इसका कारण है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन पौधों को लगाने, उन्हें संरक्षित करने व असहाय जानवरों की सेवा में लगा दिया है। रायबरेली जिले भर के कोने-कोने में ख़ासकर मंदिर परिसर में लगे हजारों पेड़ उनकी पर्यावरण के प्रति निष्ठा को दिखाते हैं। पौधों को रोपित करने के बाद उसकी देखभाल भी उनकी जिम्मेदारी में ही रहती है। उनके द्वारा लगाई गई कई वाटिका अब लहलहा रही हैं। उम्र के इस पड़ाव में शरीर भले ही कमजोर हो गया हो लेकिन उनके जूनून में कोई कमी नहीं है और अब भी वह उसी तरह अपने काम में लगे हैं। श्याम साधू का कहना है कि समाज को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। हिन्दुस्थान समाचार/

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