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कानपुर के सिद्धेश्वर धाम में बाबा के रुप में भोलेनाथ की दुआएं लेते हैं 'मुस्लिम'

-बाबा की दुआओं से परिवार में आती सुख व समृद्धि, गंगा जमुनी तहजीब को मिलता है बढ़ावा कानपुर, 11 मार्च (हि.स.)। साम्प्रदायिक विघटनकारियों ने कानपुर की तहजीब को बिगाड़ने के लिए कई बार प्रयास किये, लेकिन वह कभी सफल नहीं हो सके। हो भी कैसे क्योंकि यहां पर करीब छह सौ साल पहले हजरत सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार ने जो हिन्दू-मुस्लिम एकता का बीज बोया उसको समय-समय पर महापुरुषों द्वारा आगे बढ़ाया गया। इनमें से एक नाम वह था जो अपनी कलम की ताकत से अंग्रेंजों के नाक में दाम कर दिया और आजादी के बाद गंगा-जमुनी तहजीब को बरकरार रखने के लिए उग्र भीड़ के सामने अपने को समर्पित करते हुए शहीद हो गए। यह नाम था स्वतंत्रता सेनानी व पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का। ऐसे महापुरुषों का बोया बीज आज भी कानपुर के सिद्धेश्वर धाम में देखने को मिलता है, खासकर शिवरात्रि के पर्व पर, जहां हिन्दू भगवान के रुप में भोलेनाथ की पूजा करते हैं तो वहीं मुस्लिम लोग भी बाबा यानी अपने पूर्वज के रुप में सुख-समृद्धि के लिए दुआएं मांगते हैं। मोक्षदायिनी गंगा और जमुना के बीच दोआबा में बसे कानपुर नगर की पहचान भले ही औद्योगिक नगरी के रुप में हो, पर यहां की एकात्मता का रस ऐतिहासिक है। करीब छह सौ वर्ष पूर्व जब सत्ता संघर्ष में हिन्दुओं और मुस्लिमों की हत्या की जाती थी तो मुस्लिम संत हजरत सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार सिहर जाते थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए कानपुर शहर से करीब 60 किमी दूर बिल्हौर तहसील के मकनपुर गांव में हुजरा बसाया। इसके बाद से यह क्रम हिन्दू और मुस्लिमों के महापुरुषों ने बरकरार रखा और आजादी के बाद पनपे साम्प्रदायिक दंगे को रोकने के लिए हजरत सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार के अनुयायी व पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी आगे आये और खुद साम्प्रदायिक भीड़ में अपने को शहीद कर लिये। गणेश शंकर की कर्मस्थली कानपुर में तब से आज तक न जाने कितनी बार दुश्मनों ने तोड़ने का प्रयास किया और कभी सफल नहीं हो सके। इसी का परिणाम है कि आज भी गंगा तट पर सिद्धेश्वर धाम में भोलेनाथ के दर पर हिन्दू मुस्लिम पहुंचते हैं। यह अलग बात है कि हिन्दू भगवान के रुप में शिव को पूजते हैं तो वहीं मुस्लिम अपना पूर्वज मानकर यानी बाबा के रुप में उनकी दुआएं लेते हैं। खासकर शिवरात्रि पर हिन्दुओं के साथ मुस्लिम समाज के लोग भी बाबा के दरबार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और हिन्दू भक्तों की हर संभव मदद करने का प्रयास करते हैं। मंदिर के आस-पास 60 फीसदी मुस्लिमों की आबादी सिद्धेश्वर धाम कानपुर नगर में जिस जगह पर स्थिति है वह इलाका जाजमऊ के नाम से जाना जाता है। बताया जा रहा है कि त्रेता युग में राजा जायद ने जाजमऊ को बसाया था और उसी ने गंगा तट पर एक गाय का रोजाना बहता दूध देख जमीन की खुदाई कराई तो नीचे शिवलिंग मिला। इसके बाद राजा ने वहीं पर मंदिर की स्थापना कराई और आज यह सिद्धनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। सबसे खास बात यह है कि मौजूदा समय में मंदिर के आस-पास की आबादी में 60 फीसद मुस्लिमों की संख्या है। इस एतिहासिक मंदिर में हिन्दू और मुस्लिमों की अपनी-अपनी तरह से आस्था है और भगवान भोलेनाथ से संबंधित पर्वों में दोनो समुदाय के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। क्षेत्रीय लोगों का कहना खास बात ये है कि यहां रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोग इस मंदिर को इलाके के लिए शुभ मानते हैं। उनका मानना है कि इससे उनके परिवार में सुख- समृद्धि बनी रहती है। भले ही वे मंदिर में पूजा करने नहीं जाते हैं, लेकिन अपने पूर्वज के रुप में बाबा की दुआएं लेते हैं। जाजमऊ निवासी फरहान ने बताया कि बाबा की दुआओं से पूरे इलाके के लोग खुशहाल हैं और बाबा के दरबार में जाकर मन की शांति मिलती है। राशिद खान मानते हैं कि यहां पर मकसूद बाबा की मजार और सिद्धनाथ मंदिर दोनों एक साथ मौजूद हैं। यहां रहने वाले मुस्लिम दोनों को ही अपना बाबा मानते हैं। यही वजह है कि आज तक इस इलाके में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच झगड़ा नहीं हुआ है। इतना ही नहीं, राशिद खुद सावन के महीने में शिवलिंग के दर्शन करते हैं। कारोबार करने वाले आशिफ खान ने बकाया कि सिद्धनाथ बाबा की दुआएं हमेशा साथ रहती हैं। इस इलाके में दोनों धर्मों के बीच हमेशा शांति बनी रहती है। यहां हिंदू और मुसलमान के बीच आज तक कोई तनाव हुआ है। यही नहीं, वे सिद्धनाथ बाबा को जाजमऊ का कोतवाल भी मानते हैं। हिन्दुस्थान समाचार/अजय/

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