उदयपुर, 01 जून (हि.स.)। पेटेंट और राॅयल्टी के नियमों के चलते कोरोना जैसी महामारी में भी जीवनरक्षक औषधियां या तो आम आदमी की पहुंच में नहीं है, या आम आदमी की जेब उसे इन दवाओं से महरूम कर देती है। बड़े मुनाफे की मानसिकता ने सामान्य मानव के स्वस्थ जीवन जीने के अधिकार पर भी अवरोधक लगा रखा है। विश्व के सभी देश ‘सर्वे संतु निरामयाः’ की सोच को सुदृढ़ करते हुए आगे बढ़ेंगे और जीवनरक्षक दवाओं पर अधिकार रखने वाली कम्पनियों के पेटेंट से मुक्ति का समर्थन करेंगे तब आम आदमी को स्वास्थ्य सस्ता व सुलभ हो जाएगा। यह बात स्वदेशी जागरण मंच के चित्तौड़ प्रांत के संयोजक पुरुषोत्तम शर्मा ने मंगलवार को उदयपुर में आयोजित प्रेसवार्ता में कही। उन्होंने कहा कि आज मानव स्वास्थ्य सबसे बड़ा व्यापार बन गया है। मरता क्या न करता, आम आदमी अपना सबकुछ लुटाकर अपनों का जीवन बचाने का प्रयास करता है। क्या यह विश्व के सभी देशों के प्रमुखों और वहां के संविधानों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह इस धरती पर मौजूद मानव सभ्यता के स्वास्थ्य को असीमित मुनाफे का व्यापार बनने से रोकें। उन्होंने बताया कि रेमडेसिविर की लागत 9 डाॅलर है और बिक्री 300 डाॅलर में होती है। अब इतना बड़ा अंतर क्यों और कहां से पैदा हो जाता है। इस पर सभी देशों को सोचने का वक्त आ गया है। इन जीवनरक्षक टीकों और दवाओं को सस्ता व सर्वसुलभ कराने के लिए स्वदेशी जागरण मंच की ओर से भारत के लोगों की सहभागिता से इन टीकों व दवाओं को पेटेंट मुक्त कर इनकी टेक्नोलॉजी-फार्मुला के हस्तांतरण के लिए सघन अभियान चलाया जा रहा है। यद्यपि कोविड के इलाज से सम्बंधित कई दवाओं का भारत में उत्पादन हो रहा है, लेकिन समस्या की गंभीरता के कारण बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उपलब्ध मात्रा अत्यधिक अपर्याप्त है। पुरोहित ने बताया कि भारत बायोटेक ने अपना फार्मूला साझा करने के लिए सिर्फ इतनी बात रखी है कि उत्पादन का 50 प्रतिशत भारत का दिया जाए जिसका भुगतान भी भारत करेगा, ताकि भारत की आवश्यकता की भी पूर्ति हो सके। इजरायल, अमेरिका, इंग्लैंड आदि जिन 6 देशों की वयस्क जनसंख्या का टीकाकरण हो गया है, वहां कोरोना संकट लगभग समाप्त हो गया है। इसलिए भारत सहित विश्व की समग्र वयस्क जनसंख्या (लगभग 600 करोड़) का तत्काल टीकाकरण आवश्यक है। हालांकि, भारत में अब सरकार ने सात कम्पनियों को वैक्सीन उत्पादन की अनुमति दे दी है। शीघ्र ही स्पूतनिक-वी भी उपलब्ध होने वाली है। ऐसे में वैक्सीन की किल्लत नहीं होगी। उन्होंने बताया कि इसके लिए स्वदेशी जागरण मंच ने कोविड के टीकों व औषधियों को पेटेंट मुक्त कर इनकी टेक्नालॉजी इनके उत्पादन में सक्षम सभी दवा उत्पादकों को सुलभ कराने की मांग करते हुए सघन जन जागरण अभियान छेड़ा है। इसके अन्तर्गत देशभर में व देश के बाहर भी टीकों व औषधियों की सर्व सुलभता के लिए ‘यूनिवर्सल एक्सेस टु वैक्सीन्स एंड मेडिसिन्स’ अर्थात ‘युवम’ (यूएवीएम) के नाम से यह अभियान चल रहा है। इसमें आॅनलाइन हस्ताक्षर अभियान सहित वेबिनार, गोष्ठियों, प्रदर्शन, सम्पर्क प्रचार की प्रक्रिया चल रही है। पुरोहित ने बताया कि भारत में भी कम से कम 70 प्रतिशत जनसंख्या के टीकाकरण के लिए लगभग 200 करोड़ खुराक की आवश्यकता है। इस बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए इनकी प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की सुविधा और इनके पेटेंट और व्यापार रहस्य सहित बौद्धिक संपदा अधिकार सम्बन्धी बाधाओं को दूर करने के लिए अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उपाय करने होंगे। इसी उद्देश्य से ‘वैश्विक सर्वसुलभ वैक्सीन एवं दवाइयां अभियान’ के अंतर्गत देश और विदेश के विविध समाजिक, संस्कृतिक व सभी प्रकार के संगठनों, शिक्षण संस्थानों, प्रबुद्धजनों, शिक्षाविदों, न्यायाधीशों और सभी व्यक्तियों से सहयोग लिया जा रहा है। डिजिटल हस्ताक्षर अभियान में अभी तक लगभग चार लाख लोग इस याचिका पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। ऐसी ही एक दूसरी याचिका पर भी भारत और विश्व के 20 देशों के 1600 से अधिक अति उच्च शिक्षाविदों, प्रबुद्ध नागरिकों ने हस्ताक्षर किए हैं। हिन्दुस्थान समाचार/सुनीता कौशल/संदीप




