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Monday, March 2, 2026
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‘बॉम्बे ढाबा’ नाम देखकर क्यों आगबबूला हुए राज ठाकरे? MNS कार्यकर्ताओं ने की तोड़फोड

भिवंडी में 'बॉम्बे ढाबा' विवाद मामले में राज ठाकरे के आदेश पर MNS कार्यकर्ताओं ने बोर्ड तोड़ा। फिलहाल ढाबा मालिक ने 8 दिनों में नाम बदलने का वादा किया है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। महाराष्ट्र में नाम और पहचान का मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार विवाद भिवंडी के मुंबई-नासिक हाईवे पर स्थित ‘बॉम्बे ढाबा’ को लेकर खड़ा हुआ। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने ढाबे के नाम ‘बॉम्बे’ पर आपत्ति जताई और मनसे कार्यकर्ताओं ने तुरंत कार्रवाई करते हुए ढाबे का बोर्ड तोड़ दिया।

राज ठाकरे कल्याण से भिवंडी की ओर जा रहे थे

घटना महानगरपालिका चुनाव प्रचार के दौरान हुई। राज ठाकरे कल्याण से भिवंडी की ओर जा रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि ढाबे पर अब भी ‘बॉम्बे ढाबा’ लिखा हुआ है। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने ढाबे मालिक पर दबाव डालकर आठ दिनों के भीतर नाम बदलने का आदेश दिया। ढाबा मालिक ने इस पर हामी भर दी और नाम बदलने का वादा किया।

‘बॉम्बे’ शब्द महाराष्ट्र और मुंबई की अस्मिता के खिलाफ है

MNS कार्यकर्ताओं का कहना है कि ‘बॉम्बे’ शब्द महाराष्ट्र और मुंबई की अस्मिता के खिलाफ है और इसे जारी रखना सही नहीं। मनसे का यह कदम स्थानीय पहचान और मराठी अस्मिता की रक्षा के रूप में देखा जा रहा है।

राज ठाकरे ने कई बार मराठी अस्मिता के मुद्दे को उठाया है

राज ठाकरे ने हाल ही में कई बार मराठी अस्मिता के मुद्दे को उठाया है। उनका कहना है कि अगर बीजेपी नगर निगमों पर नियंत्रण कर लेती है तो मराठी मानुस के अधिकार खतरे में पड़ सकते हैं। उन्होंने मुंबई, ठाणे, मीरा-भयंदर, नासिक और पुणे-ठाणे के नगर निकायों में मराठी पहचान बनाए रखने पर जोर दिया।

”मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिशें की जा रही हैं”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिशें की जा रही हैं। जैसे पहले गुजरात ने मुंबई पर अपना दावा किया था, आज भी ऐसे हालात बन रहे हैं। इसलिए सीमाओं और मराठी अस्मिता की रक्षा करना जरूरी है।

‘बॉम्बे ढाबा’ मामला मराठी पहचान से जुड़ा प्रतीक बन गया है

इस विवाद ने यह दिखा दिया कि नाम और पहचान का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में कितना संवेदनशील है। ‘बॉम्बे ढाबा’ मामला केवल एक ढाबे का नहीं, बल्कि मुंबई शहर और मराठी पहचान से जुड़ा प्रतीक बन गया है।

भिवंडी में हुई यह घटना न सिर्फ राजनीतिक सुर्खियों में है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दों को भी उजागर करती है। चुनाव के बीच यह विवाद मनसे और राज ठाकरे के मराठी अस्मिता अभियान को और मजबूत करने वाला कदम माना जा रहा है।

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