Lok Sabha Election: जमशेदपुर पर अटकी सबकी सांसे, 6 बार खिला कमल, जानें अबकी बार कौन मारेगा बाजी?

Jharkhand News: झारखंड की औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में हमेशा से ही सभी राजनीतिक दलों के बीच जंग छिड़ी रही है। आगामी लोकसभा चुनाव में इस बार भी सबकी नजरें जमशेदपुर पर टिकी हैं।
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रांची (झारखंड), हि.स.। राज्य में लोकसभा चुनाव का पारा चढ़ा हुआ है। राजनीतिक दल अधिक-अधिक सीटें जीतने के लिए सारे दांव आजमा रहे हैं। इनमें जमशेदपुर लोकसभा सीट भी है, जो 1957 में अस्तित्व में आई थी। इसे टाटानगर के रूप में भी जाना जाता है। जमशेदपुर को झारखंड की औद्योगिक नगरी भी कहा जाता है। जमशेदपुर लोकसभा सीट पर कुड़मी, आदिवासी, ओड़िया, बंगाली और बिहारी वोटर निर्णायक साबित होते हैं। मुस्लिम, छत्तीसगढ़ी, कुशवाहा, यादव जैसी अन्य जाति व समुदायों के वोटरों की भी अहम भूमिका होती है।

नीतीश भारद्वाज ने भाजपा से 1996 में दर्ज की जीत

जमशेदपुर सीट पर अब तक 18 बार लोकसभा चुनाव हो चुके हैं। इनमें सबसे अधिक (छह बार) भाजपा ने यहां से जीत दर्ज की है जबकि कांग्रेस और झामुमो ने चार-चार, सीपीआई, बीएलडी, जनता पार्टी और भोजोहरि महतो ने एक-एक बार जीत हासिल की है। भाजपा ने इस सीट पर जीत दर्ज करने के लिए समय-समय पर कई प्रयोग किये हैं। इनमें वर्ष 1996 में महाभारत सीरियल में भगवान श्रीकृष्ण का किरदार निभाने वाले नीतीश भारद्वाज को प्रत्याशी बनाया। नीतीश भारद्वाज ने संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार रहे बिहार जनता दल के कद्दावर नेता सह तत्कालीन मंत्री इंदर सिंह नामधारी को 95,650 मतों से पराजित किया था।

पहली बार 1957 में हुए लोकसभा चुनाव

वर्ष 1957 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यहां से जीत दर्ज की थी। एमके घोष जमशेदपुर के पहले सांसद बने थे। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 35.5 फीसदी वोट मिले जबकि झारखंड पार्टी को 29.5 फीसदी मत प्राप्त हुए। निर्दलीय उम्मीदवार को 19 फीसदी वोट मिले। वर्ष 1962 के लोकसभा चुनाव में जमशेदपुर सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के खाते में चली गई।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार को यहां बदला था और एनसी मुखर्जी को अपना उम्मीदवार बनाया था लेकिन फिर कांग्रेस के हाथ से ये सीट निकल गई। वर्ष 1962 के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के उदयकर मिश्रा ने जमशेदपुर से जीत दर्ज की थी। उन्हें 41.3 फीसदी प्राप्त हुए थे जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 30.4 फीसदी और झारखंड पार्टी को 16.3 फीसदी मत प्राप्त हुए थे।

कांग्रेस को 1967 में मिली जीत

वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव में फिर से यहां पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जीत दर्ज की। इस बार भी कांग्रेस ने उम्मीदवार को बदला था और सुरेंद्र चंद्र प्रसाद को अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस को 35.5 फीसदी मत प्राप्त हुए थे जबकि कम्युनिस्ट पार्टी को 16.5 फीसदी और भारतीय जनसंघ को 12.6 फीसदी मत प्राप्त हुए थे।

वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने उम्मीदवार में फिर बदलाव किया और सरदार सरवन सिंह को टिकट दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को इस बार 26.6 फीसदी वोट मिले जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के केदारनाथ को 26.5 फीसदी वोट मिले। यह चुनाव काफी दिलचस्प था। क्योंकि, जीत हार का अंतर हजार वोटों से भी कम का था। ऑल इंडिया झारखंड पार्टी को 16.6 फीसदी जबकि भारतीय जनसंघ को 12.3 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे।

कांग्रेस ने हर बार बदला उम्मीदवार

वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव में भारतीय लोक दल ने जमशेदपुर सीट पर जीत दर्ज की थी। रुद्र प्रताप सारंगी को भारतीय लोकदल ने टिकट दिया था। उन्हें कुल 48.7 फीसदी वोट मिले थे जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 25.5 फीसदी वोट मिले थे। इस बार भी कांग्रेस पार्टी ने अपना उम्मीदवार बदल दिया था और वीजी गोपाल को उम्मीदवार बनाया था।

जनता पार्टी ने 1980 में जीत की दर्ज

वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में रुद्र प्रताप सिंह जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। रुद्र प्रताप सिंह को 28.5 वोट मिले थे जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 25.3 और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को 23.8 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में फिर से कांग्रेस पार्टी ने सीट पर कब्जा किया। हालांकि, इस बार भी कांग्रेस पार्टी ने उम्मीदवार बदलते हुए गोपेश्वर कुमार को टिकट दिया था। उन्हें 44.4 फीसदी वोट मिले थे। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को 29.5 फीसदी वोट मिले। इस बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने टीकाराम मांझी को यहां से उम्मीदवार बनाया। भाजपा को 10.2 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे जबकि झामुमो को 5.1 फीसदी वोट मिले थे।

झामुमो ने 1991 फिर हासिल की जीत

वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में जमशेदपुर सीट पर फिर परिवर्तन हुआ और इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने जमशेदपुर लोकसभा सीट पर कब्जा किया। झामुमो के शैलेंद्र महतो ने 26.3 फीसदी वोट के साथ इस सीट पर कब्जा किया था जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चंदन बागची को 24.7 फीसदी वोट मिले थे। इस बार भी कांग्रेस पार्टी ने यहां उम्मीदवार बदला था। दूसरी तरफ रुद्र प्रताप सारंगी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे, जिन्हें 22.3 फीसदी वोट मिले थे जबकि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को 21.4 फीसदी रिपोर्ट प्राप्त हुए थे। वर्ष 1991 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से झामुमो ने ने इस सीट पर कब्जा किया। झामुमो ने के शैलेंद्र महतो को 39.3 फीसदी वोट मिले थे जबकि भाजपा को 28.5 और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 16.8 फीसदी वोट मिले।

भाजपा ने 1996 में जीत दर्ज की

वर्ष 1996 में भाजपा के नीतीश भारद्वाज ने इस सीट पर जीत दर्ज की। भाजपा को 32.9 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि, इस बार जनता दल से इस सीट पर झारखंड के बड़े कद्दावर नेता इंदर सिंह नामधारी चुनाव लड़े थे लेकिन उन्हें 24.7 फीसदी वोट ही मिले। झामुमो के शैलेंद्र महतो को 19.5 फीसदी वोट मिले थे। वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उम्मीदवार बदला और आभा महतो को टिकट दिया। इसका फायदा भी पार्टी को मिला।

1999 में फिर भाजपा ने फिर दर्ज कराई जीत

भाजपा ने 1998 के चुनाव में कुल 41 फीसदी वोट हासिल कर जीत दर्ज की। स्वतंत्र उम्मीदवार को 27.5 फीसदी वोट मिले। वर्ष 1999 की लोकसभा चुनाव में एक बार फिर आभा महतो ने भाजपा की सीट से जीत दर्ज की। उन्हें 44.9 फीसदी वोट प्राप्त हुए जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के घनश्याम महतो को 25.8 फीसदी वोट मिले। इसके अलावा झामुमो के सुनील कुमार महतो को 12.7 फीसदी वोट प्राप्त हुए।

2009 में अर्जुन मुंडा ने दर्ज की जीत

झारखंड पटवारी के बाद 2004 में हुए हुए पहले लोकसभा चुनाव में जमशेदपुर की सीट पर झामुमो का कब्जा हुआ। यहां सुनील कुमार महतो ने जीत दर्ज की। इस बार झामुमो को इस सीट पर कुल 51 फीसदी वोट प्राप्त हुए जबकि भाजपा को 37.4 फीसदी वोट मिले। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर यहां परिवर्तन हुआ और जमशेदपुर सीट से भाजपा उम्मीदवार अर्जुन मुंडा ने जीत दर्ज की। अर्जुन मुंडा को 45.3 फीसदी वोट को मिले थे। इस चुनाव में झामुमो को 28.3 और झारखंड विकास मोर्चा को 11.2 फीसदी वोट प्राप्त हुए थे।

हैट्रिक की तैयारी में विद्युत वरण

जमशेदपुर में भाजपा लगातार दो बार हैट्रिक (1996, 1998, 1999 और 2009, 2014 व 2019) लगा चुकी है। वर्ष 1996 में नीतीश भारद्वाज, 1998 व 1999 में आभा महतो, 2009 में अर्जुन मुंडा, 2014 तथा 2019 में विद्युत वरण महतो ने जीत हासिल की। व्यक्तिगत तौर पर रुद्र प्रताप षाड़ंगी (1977-80), शैलेंद्र महतो (1989-91), आभा महतो (1998-99) और विद्युत वरण महतो (2014-2019) ऐसे जनप्रतिनिधि हैं, जिन्होंने दो-दो बार जीत हासिल की।

इस बार भी भाजपा ने विद्युत वरण महतो पर जताया भरोसा

भाजपा से फिर विद्युत वरण महतो प्रत्याशी बनाये गये हैं। यदि वे जीत दर्ज करते हैं, तो वे पहले प्रत्याशी होंगे जो इस सीट से हैट्रिक लगायेंगे। साथ ही चौथी बार लगातार भाजपा की झोली में यह सीट जायेगी। फिलहाल सभी पार्टी 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटे हुए हैं। इस बार भी यहां से भाजपा ने विद्युत वरण महतो पर भरोसा जताया है।

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