Shankaracharya: कौन होते हैं शंकराचार्य, क्या होती है इसके लिए योग्यता? यहां जानिए हिंदू धर्म में इनकी महत्ता

Delhi News: देशभर में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां पूरे जोरो पर है, कहीं भी किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है।
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नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। देशभर में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां पूरे जोरो पर है, कहीं भी किसी तरह की कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है। प्राण प्रतिष्ठा के लिए देश के हर क्षेत्र से जुड़ी जानी मानी हस्तियों और साधु-संतों को मंदिर ट्रस्ट की ओर से निमंत्रण भेजा गया है। निमंत्रण को लेकर शंकराचार्यों का नाम बहुत ही ट्रेंड कर रहा है और सबके लिए चर्चा का विषय बना हुआ है।

शंकराचार्यों को लेकर सब जानकारी हम इस खबर में जानेंगे

शंकराचार्यों को लेकर लोगो के मन में बहुत से सवाल उठ रहे हैं, हर कोई जानना चाहता है कि यह कौन होते हैं और इनका क्या महत्व होता है। इस को लेकर हम जानकारी देंगे कि आखिर शंकराचार्य कौन होते हैं और हिन्दू धर्म में इनकी क्या अहमियत है। यह सब जानकारी हम इस खबर में जानेंगे।

कौन होते हैं शंकराचार्य?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मठो की शुरुआत करने वाले आदि शंकराचार्य थे। जो हिन्दू दार्शनिक और धर्मगुरु थे। उनके धार्मिक कार्यो की वजह से उन्हें जगदगुरू के नाम से भी जाना जाता है। आदि शंकराचार्य सनातन धर्म की रक्षा और प्रसार करना चाहते थे। अपने इस उदेश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने चार शिष्यों को चार दिशाओ में स्थापित किये गए मठो की जिम्मेदारी दी। इन ही मठो के प्रमुख को शंकराचार्य की उपाधि दी गयी है। सनातन धर्म में शंकराचार्य को सर्वोच्च माना गया है।

मठ/पीठ क्या होते हैं?

सनातन धर्म के अनुसार आदि शंकराचार्य द्वारा चालू किये गए मठो में गुरु अपने शिष्यों को सनातन धर्म का ज्ञान और शिक्षा दोनों देते हैं, जिसे आध्यात्मिक शिक्षा कहते हैं। इन मठो में सामाजिक सेवा, जीवन से जुड़े पहलुओं और साहित्य आदि का ज्ञान भी दिया जाता है। भारत में चार प्रमुख मठ है, जिनका नाम द्वारका, ज्योतिष, गोवर्धन और शृंगेरी पीठ है। यहां पीठ शब्द का अर्थ मठ ही है। संस्कृत में मठ को ही पीठ कहते हैं।

कैसे होता है शंकराचार्य का चयन?

शंकराचार्य के पद को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को त्यागी, संस्कृत, चतुर्वेद, वेदांत ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, दंडी संन्यासी और पुराणों का ज्ञान होना अनिवार्य है। साथ ही उन्हें अपने गृहस्थ जीवन, मुंडन, पिंडदान और रूद्राक्ष धारण करना काफी अहम माना जाता है। शंकराचार्य के पद के लिए व्यक्ति को ब्राह्मण होना अनिवार्य है, जिन्हे चारों वेद और छह वेदांगों का ज्ञाता होना चाहिए। शंकराचार्य की पदवी के लिए अखाड़ों के प्रमुखों, आचार्य महामंडलेश्वरों, प्रतिष्ठित संतों की सभा की सहमति और काशी विद्वत परिषद की स्वीकृति की मुहर होना जरुरी होता है।

कौन सा मठ कहाँ है उपस्थित?

ओडिशा के पुरी राज्य में गोवर्धन मठ स्थापित है। निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के शंकराचार्य हैं। शारदा मठ, गुजरात के द्वारकाधाम में स्थित है। सदानंद सरस्वती ही शारदा मठ के शंकराचार्य हैं। उत्तराखंड के बद्रिकाश्रम में ज्योर्तिमठ स्थित है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस मठ के शंकराचार्य हैं। दक्षिण भारत के रामेश्वरम में शृंगेरी मठ स्थापित है। जगद्गुरु भारती तीर्थ इस मठ के शंकराचार्य हैं।

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