Farmer Protest: 'चलो दिल्ली' किसान आंदोलन 2.0 सड़कों पर उतरने का क्या है पूरा मामला?

New Delhi: किसान आंदोलन ने एक बार फिर दिल्ली आने की हुंकार भर ली है। हरियाणा पुलिस ने किसानों को अंबाला के शंभू बॉर्डर पर रोक लिया है। इस बीच किसानों और पुलिस के बीच मुठभेड़ में कई लोग घायल हो गए।
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नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। मंगलवार को हरियाणा के शंभू बॉर्डर में पुलिस और किसान के बीच हुई मुठभेड़ ने पूरे देश को झकजोर कर रख दिया। अपने ही देश में किसानों को अपनी मांगे पूरी कराने के लिए सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करना पड़ रहा है। हरियाणा के शंभू बॉर्डर पर राज्य पुलिस के साथ केंद्र बल के जवान तैनात हैं। आंदोलन कर रहे किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए सभी सीमाओं पर किलाबंदी कर दी गई है। दिल्ली के टिकरी बॉर्डर, गाजीपुर बॉर्डर और सिंघु बॉर्डर पर कांटों, लोहे के तार, सीमेंट से बनाई हुई दिवारों से बंंद कर दिया गया है। किसानों ने इस आंदोलन को 'चलो दिल्ली' का नारा दिया है।

'जय जवान, जय किसान'

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश को 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया था। एक समय वो था और एक समय आज है जवान और किसान आपस में लड़ रहे हैं। ये मुद्दा अब किसान से राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। एक तरफ जहां मोदी सरकार किसानों से बातचीत कर मुद्दे को शांत करना चाहती है वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक्स पर सरकार को किसानों की मांग पूरी करने की बात कही।

किसान मजदूर संघर्ष कमिटी के जेनरल सेक्रेटरी सरवन सिंह पंढेर का बयान

शंभू बॉर्डर पर मंगलवार से लगातार किसानों पर लाठीचार्ज किया। इससे भी मामला जब नहीं थमा तो पुलिस को मजबूरन आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। किसान भी अपनी मांगों को लेकर पीछे नहीं हटना चाहते। किसान मजदूर संघर्ष कमिटी के जेनरल सेक्रेटरी सरवन सिंह पंढेर ने आज प्रेस कांफ्रैंस में कहा कि "हम किसानों को बदनाम किया जा रहा है, हमें खलिस्तानी आतंकवादी कहा जा रहा है। हमारे बारे में गलत अफवाह फैलाई जा रही है। हम शांतिपूर्वक आंदोलन करना चाहते हैं।" आपको बता दें कि मंगलवार को शंभू बॉर्डर पर पुलिस और किसानों के बीच हुई मुठभेड़ में किसानों ने पुलिस के खिलाफ पत्थरबाजी की थी। इससे साफ पता चलता है कि न किसान पीछे हटने के लिए तैयार है और न ही सरकार और पुलिस प्रशासन।

आखिर क्या है किसानों की वापस दिल्ली में आंदोलन करने की वजह?

2021 में जब किसानों ने अपने दम पर लंबे चले आंदोलन से मोदी सरकार द्वारा पेश 3 किसान बिलों को वापस लेने में मजबूर किया। उससे पता चलता है देश में सरकार से ज्यादा जनता के पास ताकत है। हालांकि गरीबी, भ्रष्टाचार जैसे अन्य मुद्दों पर जनता में ऐसा आक्रोश देखने के लिए नहीं मिलता। इस बार किसान पिछली बार छुट गए मुद्दों को पूरा कराने के लिए वापस राजधानी दिल्ली की ओर कदम बढ़ा रही है।

क्या है किसानों की मांग?

1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के कानून को लागू करना।

2. सरकारी और प्राइवेट लोन को माफ किया जाए।

3. लखीमपुर खीरी हमलें में मारे गए किसानों को न्याय मिलना और उनके परिवार से किसी एक सदस्य को नौकरी देना शामिल है।

4. 58 साल से अधिक किसानों को 10 हजार रुपये पेंशन में दिए जाए।

5. साल 2021-22 में किसान आंदोलन के दौरान किसानों पर चल रहे मुकदमें को खत्म किया जाए।

6. कृषि वस्तुओं, दूध उत्पादों, फलों, सब्जियों और मांस पर आयात शुल्क कम किया जाए।

7. स्वामीनाथन आयोग को लागू किया जाए।

8. कीटनाशक, बीज व उर्वरक अधिनियम में संशोधन करके इन्हें बनाने वाली प्राइवेट कंपनियों पर लगाम लगाई जाए।

किसानों की मांगों पर जल्दबाजी में कोई फैसला लेना ठीक नहीं: मुंडा

केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा ने बुधवार को कहा कि किसानों की मांगों पर जल्दबाजी में कोई फैसला लेना उचित नहीं होगा। मुंडा ने मीडियाकर्मियों से कहा कि केंद्र सरकार किसानों के हितों को लेकर गंभीर है। ऐसे में किसान संगठनों को यह समझना चाहिए कि जिस कानून की बात की जा रही है उस कानून के बारे में इस तरीके से कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है। इस संबंध में सोच-विचार की जरूरत है। मुंडा ने कहा कि प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों को यह भी सोचना चाहिए कि उनके नाते आम लोगों को कोई समस्या न होने पाए।

उल्लेखनीय है कि किसान संगठनों की प्रमुख मांगों में सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी की मांग सबसे अहम है। इसे किसान हर हाल में चाहते हैं लेकिन सरकार इस मुद्दे पर कोई फैसला जल्दबाजी में नहीं लेना चाहती है। वह सभी पहलुओं पर गंभीर विचार करके ही फैसला लेना चाहती है।

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