पार्टियों के चुनावी बॉन्ड पर SC ने लगाई रोक, कहा- SBI को बताना होगा किस-किसने कितने इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदा

New Delhi: चुनावी बांड योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।
SC on Electoral Bond
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नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड पर आज फैसला सुनाते हुए इस पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को चुनावी बांड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के संबंध में अपना फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने पिछले साल 2 नवंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

कैसे होती है राजनीति में फंडिंग?

राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए 2017 के केंद्रीय बजट केंद्र सरकार द्वारा चुनावी बांड योजना पेश किए गए था। इसमें पैसा दान करने वाले व्यक्ति की पहचान को गुमनाम रखा जाता है। निजी कंपनियां इन बांडों को खरीद सकती हैं और राजनीतिक दलों को ट्रांसफर कर सकती हैं। अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी प्रक्रिया में नकद को कम करने की आवश्यकता पर बल देते हुए चुनावी बांड योजना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। लेकिन अब इस मामले में एक यातिकाकर्ता ने चुनौती देते हुए मामले की फिर से सुनवाई करने की सिफारिश की थी। इसके बाद आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया।

कौन ले सकता है चुनावी बांड?

चुनावी बांड योजना को सरकार द्वारा 2 जनवरी, 2018 को अधिसूचित किया गया था। राजनीतिक दलों को पार्टियों के रूप में दिए जाने वाले नकद दान के विकल्प के रूप में पेश किया गया था। आसान भाषा में कहे तो चुनावी बांड मौद्रिक उपकरण हैं जिन्हें नागरिक या कॉर्पोरेट समूह बैंक खासकर 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' से खरीद सकते हैं और एक राजनीतिक दल को दे सकते हैं, जो बाद में इस पैसे का प्रयोग राजनीतिक गतिविधियों के लिए कर सकती है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत राजनीतिक दल और जिन्होंने लोकसभा या राज्य विधान सभा के पिछले आम चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट हासिल किए थे केवल वही पार्टी ही चुनावी बांड प्राप्त कर सकने में योग्य हैं। इसके साथ ही

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