नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने ADR द्वारा निर्वाचन आयोग द्वारा वोटिंग पर्सेंटेज को पब्लिक करने की याचिका को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हवाला दिया कि अपलोड करने के काम में कई लोग लगेंगे, साथ ही पहले ही कई चरण में मतदान संपन्न हो चुका है। लेकिन निर्वाचन आयोग द्वारा जनता को वास्तविक समय पर अनुमानित वोटिंग पर्सेंटेज देने के लिए लॉन्च किए गए ऐप की दुर्दशा समझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के लिए ‘आ बैल मुझे मार’ मुहावरे का इस्तेमाल किया।
ऐप को लेकर क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
निर्वाचन आयोग द्वारा लॉन्च किए गए मोबाइल ऐप ‘वोटर टर्नआउट’इस तरह से डिजाइन किया गया है कि हर राज्य में अनुमानित मतदान प्रतिशत बताया जा सके। इसके जरिये संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र स्तर तक के अनुमानित मतदान प्रतिशत को देखा जा सकता है।
ऐप को लेकर किया सवाल
न्यायमूर्ति दत्ता ने निर्वाचन आयोग के वकील मनिंदर सिंह से खासतौर से तैयार किए गए ऐप के बारे में पूछा कि क्या रियल टाइम के आधार पर आंकड़ा अपलोड करने की कोई वैधानिक आवश्यकता है। जिसका जवाब देते हुए वकील मनिंदर सिंह ने कहा कि ऐसी कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं है। यह ऐप केवल निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता को दिखाने के लिए है।
ADR की याचिका का दिया हवाला
न्यायमूर्ति ने कहा कि ADR की याचिका को उन्होंने खारिज कर दिया था फिलहाल के मतदान को चलते हुए देखते हुए। लेकिन ऐप के जरिए आयोग खुद आंकड़ों को सार्वजनिक कर रहा है। न्यायमूर्ति ने कहा कि पिछली सुनवाई में उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन इस ऐप को देखकर उन्हें लगता है कि आयोग ‘आ बैल मुझे मार’ वाली स्थिति में है। अदालत ने आधारहीन आशंकाओं और संदेहों के बारे में चुनाव आयोग की चिंताओं से सहमति व्यक्त की।
खबरों के लिए क्लिक करें:- www.raftaar.in





