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Wednesday, March 18, 2026
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Hindu Marriage: हिंदू विवाह केवल खाने-पीने और तोहफे देने का समारोह नहीं, रीति-रिवाजों के बिना शादी अवैध: कोर्ट

जब तक रस्में नहीं निभाई जातीं, तब तक विवाह को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत वैध नहीं माना जा सकता है। यह एक संस्कार और एक धार्मिक परंपरा है, जिसे भारतीय समाज के अहम संस्थान का दर्जा दिया जाना जरूरी है।

नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह कोई नाचने-गाने या खाने-पीने का मौका भर नहीं है और न यह कोई व्यापारिक लेन-देन का इवेंट है। जब तक इसमें रस्में नहीं निभाई जातीं, तब तक इसे हिंदू मैरिज एक्ट के तहत इसे वैध नहीं माना जा सकता है।

बेंच ने क्या कहा?

जस्टिस बीवी नागरत्ना और ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि हिंदू विवाह एक संस्कार और एक धार्मिक परंपरा है, जिसे भारतीय समाज के अहम संस्थान का दर्जा दिया जाना जरूरी है। कोर्ट ने यह बात दो कॉमर्शियल पायलट्स के तलाक के मामले की सुनवाई के दौरान कही, जिन्होंने वैध हिंदू विवाह समारोह नहीं किया था।

बेंच ने दोनों पायलट्स की शादी को अवैध बताया

बेंच ने संविधान के आर्टिकल 142 का हवाला देते हुए कहा कि दोनों पायलट कानून के मुताबिक शादीशुदा नहीं हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने उनके मैरिज सर्टिफिकेट को रद्द करार दे दिया। कोर्ट ने उनके तलाक की प्रक्रिया और पति व उसके परिवार पर लगाया गया दहेज का केस खारिज कर दिया।

शादी करने के पहले करें सोच-विचार

बेंच ने कहा कि शादी कोई नाचने-गाने और खाने-पीने का इवेंट नहीं है। न ये कोई ऐसा मौका है जहां आप एक-दूसरे पर दबाव डालकर दहेज और तोहफों का लेनदेन करें, जिससे बाद में केस होने की संभावना रहे। बेंच ने युवा पुरुष और महिलाओं की शादी की संदर्भ में कहा कि शादी के बंधन में बंधने के पहले विवाह के बारे में अच्छे से सोच लें और ये समझने की कोशिश करें कि ये भारतीय समाज के लिए कितना पवित्र है।

विवाह की महत्वता

बेंच ने विवाह समारोह को ऐसा गंभीर बुनियादी मुद्दा बताया, जो एक पुरुष और महिला के बीच बने रिश्ते की खुशी मनाने का मौका होता है। इस समारोह से एक पुरुष और महिला को पति-पत्नी का दर्जा मिलता है, जो परिवार बनाता है। यही परिवार भारतीय समाज की मूलभूत इकाई है।

दो लोगों की मर्जी से होता है विवाह

विवाह से न सिर्फ दो लोग अपनी मर्जी से साथ आते हैं, बल्कि दो परिवार भी एकजुट होते हैं। कोर्ट ने कहा कि विवाह एक पवित्र चीज है क्योंकि यह जीवन भर के लिए दो लोगों को आत्म सम्मान के साथ बराबरी का अधिकार देते हुए साथ लाता है। हिंदू विवाह परिवारों को जोड़ता है और अलग-अलग समुदायों के बीच भाईचारे की भावना को मजबूत करता है।

बिना रस्म-रिवाज के विवाह की निंदा

कोर्ट ने कहा कि हम उस चलन की निंदा करते हैं, जिसमें युवा महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे के पति-पत्नी का स्टेटस पाने के लिए हिंदू मैरिज एक्ट के तहत बिना विवाह संस्कार के कथित तौर पर शादी करते हैं। ठीक ऐसा ही दोनों पायलट्स के केस में हुआ, जो बाद में शादी करने वाले थे।

कोर्ट का कहना विवाह में पति-पत्नी बराबर होते हैं

19 अप्रैल के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि जहां हिंदू विवाह सप्तपदी जैसे सभी रीति-रिवाजों के साथ नहीं हुआ है, उसे हिंदू विवाह नहीं माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि हमारा मानना है कि हिंदू विवाह पवित्र होता है। कोर्ट ने कहा कि सप्तपदी की बात करें तो, ऋगवेद के मुताबिक, सातवां फेरा पूरा होने पर दुल्हन दूल्हे से कहती है कि इन सात फेरों के साथ हम सखा बन गए हैं। मैं जीवनभर इस मित्रता के बंधन में रहूं, इससे कभी अलग न होना पड़े। पत्नी को अर्धांगनि कहते हैं पर उसे अपनी खुद की पहचान के साथ स्वीकार किया जाता है और वह विवाह में उसका बराबरी का हक होता है।

कौन-कौन समुदाय आता है हिंदू विवाह अंतर्गत

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि 18 मई, 1955 को अधिनियम लागू होने के बाद, इसने हिंदुओं के बीच विवाह से संबंधित नियम को कानूनी रूप दिया था और इसमें न केवल हिंदू शामिल हैं, बल्कि लिंगायत, ब्रह्मोस, आर्यसमाजी, बौद्ध, जैन और सिख भी शामिल हो सकते हैं। हिंदू शब्द के व्यापक अर्थ के तहत आने वाला एक वैध हिंदू विवाह। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि विवाह रजिस्ट्रेशन का फायदा यह है कि यह विवादित मामले में शादी के तथ्य का प्रमाण प्रदान करता है, लेकिन अगर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के मुताबिक कोई विवाह नहीं हुआ है, तो “रजिस्ट्रेशन विवाह को वैधता प्रदान नहीं करेगा।”

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