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Thursday, April 9, 2026
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दिल्ली की हवा में अब अदृश्य ज़हर! JNU रिसर्च में दवा-प्रतिरोधी खतरनाक बैक्टीरिया का खुलासा

JNU की एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि दिल्ली की जहरीली हवा में दवा-प्रतिरोधी खतरनाक बैक्टीरिया फैल रहे हैं, जो आम एंटीबायोटिक दवाओं को बेअसर कर सकते हैं।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। दिल्ली की जहरीली हवा से जूझ रहे लोगों के लिए खतरा अब सिर्फ प्रदूषण तक सीमित नहीं रह गया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की एक ताजा रिसर्च ने राजधानी की सेहत को लेकर गंभीर चिंता बढ़ा दी है। इस अध्ययन में दावा किया गया है कि दिल्ली-एनसीआर की हवा में खतरनाक दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया फैल रहे हैं, जिन पर आम एंटीबायोटिक दवाएं भी असर नहीं कर पा रहीं।

आम लोगों के संपर्क में आने का खतरा और बढ़ जाता है

सर्दियों के मौसम में जब पहले से ही स्मॉग और प्रदूषण दिल्लीवासियों की सांसों पर भारी पड़ता है, उसी दौरान हवा में मौजूद इन बैक्टीरिया की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। JNU के स्कूल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंसेज के शोधकर्ताओं के अनुसार, यह बैक्टीरिया घर के अंदर और बाहर दोनों जगह की हवा में पाए गए हैं, जिससे आम लोगों के संपर्क में आने का खतरा और बढ़ जाता है।

इलाज करना बेहद मुश्किल हो सकता है

नेचर जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च के मुताबिक, हवा में पाए गए बैक्टीरिया में मेथिसिलिन-प्रतिरोधी स्टैफिलोकोसी (MRS) मौजूद हैं। ये ऐसे बैक्टीरिया हैं, जो सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं को बेअसर बना देते हैं। इसका मतलब यह है कि अगर इन बैक्टीरिया से संक्रमण होता है, तो उसका इलाज करना बेहद मुश्किल हो सकता है।

आमतौर पर इंसानों और जानवरों दोनों को संक्रमित करती हैं

शोध के दौरान दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से हवा के सैंपल इकट्ठा किए गए। जांच में सामने आया कि हवा में मौजूद बैक्टीरिया के 74 प्रतिशत स्ट्रेन एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी थे, जबकि 36 प्रतिशत स्ट्रेन कई दवाओं के खिलाफ एक साथ प्रतिरोध दिखा रहे थे। इस अध्ययन में स्टैफिलोकोकस बैक्टीरिया की कुल 8 प्रजातियों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से दो ऐसी प्रजातियां पाई गईं, जो आमतौर पर इंसानों और जानवरों दोनों को संक्रमित करती हैं।

मौसम का इन सूक्ष्म जीवों के फैलाव पर सीधा असर पड़ता है

रिसर्च की मुख्य शोधकर्ता माधुरी सिंह का कहना है कि सर्दियों में बैक्टीरिया की यह बढ़ोतरी इस बात को समझने में मदद करती है कि ठंड के मौसम में फेफड़ों और सांस से जुड़ी बीमारियां क्यों ज्यादा गंभीर हो जाती हैं और लंबे समय तक ठीक क्यों नहीं होतीं। उन्होंने यह भी बताया कि मॉनसून के दौरान दिल्ली की हवा में बैक्टीरिया की संख्या सबसे कम पाई गई, जिससे साफ है कि मौसम का इन सूक्ष्म जीवों के फैलाव पर सीधा असर पड़ता है।

उसमें मौजूद जैविक खतरों पर भी गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है

कुल मिलाकर, JNU की यह रिसर्च दिल्ली की हवा में छिपे उस अदृश्य खतरे की ओर इशारा करती है, जो प्रदूषण के साथ मिलकर लोगों की सेहत पर दोहरी मार डाल रहा है। यह अध्ययन न सिर्फ स्वास्थ्य विशेषज्ञों बल्कि नीति निर्माताओं के लिए भी चेतावनी है कि हवा की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ उसमें मौजूद जैविक खतरों पर भी गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है।

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