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Tuesday, March 3, 2026
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भारत में वायु प्रदूषण ने ले ही डेढ़ लाख से ज्यादा बच्चों की जान, CPCB की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु के लिए वायु प्रदूषण को तीसरा प्रमुख कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण के नकारात्मक प्रभाव से बच्चे अत्यधिक प्रभावित होते हैं।

नई दिल्‍ली/रफ्तार डेस्‍क। पिछले कुछ महीनों से राजधानी दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर गंभीर से अति गंभीर श्रेणी में बना हुआ है। यहां 400 या इससे अधिक वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) पर रहना कई मायनों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, वायु प्रदूषण से फिलहाल बहुत ज्यादा राहत मिलने की संभावना तो नहीं है । केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा जारी 263 शहरों की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली का एयर इंडेक्स देश में सबसे अधिक है। इस माह अब तक तीन दिन हवा की गुणवत्ता गंभीर श्रेणी में रहा है। बाकी दिन हवा की गुणवत्ता बेहद खराब श्रेणी में रही। ऐसे में वायु प्रदूषण और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ी एक स्टडी काफी डरा रही है। 

भारत के इन राज्‍यों के बच्‍चे हुए सबसे अधिक प्रभावित 

दरअसल, कोलैबोरेशन फॉर एयर पॉल्यूशन एंड हेल्थ इफेक्ट्स रिसर्च (सीएपीएचआर) इंडिया के विश्लेषण में कहा गया है कि बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण बच्चों में गंभीर बीमारियों और मौतों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 2019 में बाहरी वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की सबसे ज्यादा मौतें हुईं। इसके बाद हरियाणा और पंजाब में भी बच्चों की मृत्यु दर बहुत अधिक रही हैं। ये आंकड़े वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों से संबंधित पिछले शोध और पूर्वानुमान मॉडल पर आधारित हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अकेले 2019 में, बाहरी स्रोतों से प्रदूषण और हवा में पीएम 2.5 में वृद्धि के साथ-साथ खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन के उपयोग के कारण भारत में 1.6 लाख से अधिक मौतें हुईं, जिनमें से 1.5 लाख से अधिक मौतें 14 में हुईं। एक वर्ष छोटे बच्चों से संबंधित थे।

पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत का कारण बना वायु प्रदूषण 

भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु के लिए वायु प्रदूषण को तीसरा प्रमुख जोखिम कारक बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण के नकारात्मक प्रभाव से बच्चे अत्यधिक प्रभावित होते हैं। इतना ही नहीं, इसका उनके पूरे जीवन काल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। रिपोर्ट कहती है कि साल 2019 में उत्तराखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आउटडोर पीएम 2.5 से संबंधित मौतों का प्रतिशत बढ़ गया। जबकि गोवा, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश में कुछ गिरावट देखी गई। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की 10% से अधिक मौतें घर में खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन के उपयोग से जुड़ी हैं।

धुंआ बना अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी का मुख्‍य कारण 

वायु प्रदूषण और उसके स्वास्थ्य जोखिमों पर एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि धुएं और प्रदूषण के कारण कई हानिकारक रसायन हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं, जिससे अंगों और उनकी कार्यप्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। धुएं में मौजूद प्रदूषक कण और हानिकारक गैसें श्वसन तंत्र पर बुरा प्रभाव डालती हैं। जब हम धुएं में सांस लेते हैं तो ये कण हमारी नाक, गले, फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी, सांस लेने में तकलीफ और खांसी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से ही सांस की समस्याओं से पीड़ित लोगों को विशेष रूप से खतरा होता है।

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