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Wednesday, March 11, 2026
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रेल दुर्घटना के बाद शवों को स्कूल में रखा, डर से बच्चे नहीं आ रहे स्कूल; अब प्रशासन तोड़ रहा बिल्डिंग

स्कूल प्रशासन ने स्कूल को ढहाने के लिए जिला प्रशासन को प्रस्ताव भेजा था, जिसके बाद राज्य सरकार ने एक दिन बाद इसे मंजूरी दे दी है।

नई दिल्ली, रफ्तार न्यूज डेस्क। ओडिशा के बालासोर जिले में पिछले दिनों हुई रेल दुर्घटना में कई लोगों की जान चली गई थी। जबकि, कई लोग बुरी तरह से घायल हो गए थे। बहरहाल, सीबीआई मामले की जांच कर रही है कि एक्सीडेंट क्यों हुआ? लेकिन आपको इस घटना के अलावा एक और बात बता दें कि दुर्घटना में जिन लोगों की जान गई थी, उनके शवों को एक स्कूल में रखा गया था अब इसके कारण बच्चे स्कूल में पढ़ने के लिए नहीं आ रहे और स्कूल को तोड़ा जा रहा है।

तीन महीने में पूरा किया जाएगा निर्माण कार्य

ओडिशा में तीन ट्रेनों के टकराने से हुए हादसे ने पूरे देश को हिला दिया था। इसमें लगभग 288 लोगों की मौत हो गई थी। जबकि, एक हजार के आस-पास लोग घायल हुए थे। इस हादसे में मारे गए लोगों के शवों को अस्थायी तौर पर एक प्राइमरी स्कूल में रखा गया। इन शवों को स्कूल में रखे जाने की वजह से बच्चे पढ़ने के लिए नहीं आ रहे थे। जिसके चलते स्कूल को प्रशासन और पीडब्ल्यूडी की मौजूदगी में ढहाया जा रहा है। स्कूल को दोबारा बनाने के लिए तीन महीने का समय रखा गया है।

स्कूल प्रशान ढहाने के लिए जिला प्रशासन को भेजा था प्रस्ताव

स्कूल प्रशासन ने स्कूल को ढहाने के लिए जिला प्रशासन को प्रस्ताव भेजा था, जिसके बाद राज्य सरकार ने एक दिन बाद इसे मंजूरी दे दी है। इस संबंध में ओडिशा के चीफ सेक्रेटरी और मास एजुकेशन डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी ने वर्चुल मीटिंग की थी।

जहां पर शवों को रखा गया था उसे जाएगा ढहाया

स्कूल प्रशासन के एक सदस्य ने बताया कि स्कूल को ढहाने का प्रस्ताव शुक्रवार को मंजूर किया गया। जहां पर शवों को रखा गया, उस जगह नया निर्माण कार्य किया जाएगा। जब नया निर्माण हो जाएगा तो बच्चों के पेरेंट्स उन्हें स्कूल भेजने से नहीं कतराएंगे।

बच्चों को माता-पिता नहीं भेज रहे थे स्कूल

वहीं, दूसरे स्कूल प्रशासन के सदस्य ने कहा कि हम इस निर्णय का स्वागत करते हैं, स्कूल की दीवार और बाकी निर्मणाधीन जगह को गिराया जाएगा। इसे गर्मी की छुट्टियों को खत्म होने से पहले पूरा किए जाने की योजना है ताकि जब बच्चे स्कूल आएं तो उनके लिए एक नई शुरुआत हो। बता दें कि स्कूल प्रशासन को ये फैसला इसलिए लेना पड़ा क्योंकि कुछ माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतरा रहे थे।

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