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Wednesday, March 4, 2026
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गुरु भक्ति के मिसाल थे महर्षि संतसेवी जी महाराज : शान्तानन्द

नवादा , 4 जून (हि .स.)। प्रकृति की गोद में अवस्थित पूज्यपाद स्वामी नित्यानंद जी महाराज की तपःस्थली महर्षि संतसेवी ध्यानयोग आश्रम धनावाँ में शुक्रवार को 20 वीं सदी के महान संत व संतमत के पुरोधा महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के मस्तिष्क स्वरुप पट्ट शिष्य महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज का 15 वाँ महापरिनिर्वाण दिवस स्वामी शांतानंद जी महाराज के सान्निध्य में कोरोना गाइडलाईन को देखते हुए सादे समारोह में मनाया गया। इस अवसर पर विशेष पूजा – अर्चना, ईश्वर स्तुति- विनती वेद ग्रंथ पाठ तथा सत्संग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत ब्रह्ममुुहूर्त में सुबह 3 बजे ध्यानाभ्यास से हुई। दिन भर में एक- एक घंटे पांच बार ध्यानाभ्यास तथा तीन बार सत्संग प्रवचन हुआ। प्रातः 6बजे से ईश्वर स्तुति, गुरु विनती वेद मंत्र पाठ, प्रवचन के साथ सत्संग की शुरुआत स्वामी शांतानंद जी महाराज ने की। 8.30बजे महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज की तस्वीर पर आश्रम वासियों ने पुष्पांजलि की । दोपहर के सत्संग कार्यक्रम के मौके पर महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज के जीवन चरित्र व व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महर्षि संतसेवी जी महाराज का आविर्भाव 20दिसंबर 1920ई. को बिहार के मधेपुरा जिले के ग्राम गम्हरिया में कायस्थ कुल श्री बलदेव लाला दास के सुपुत्र के रुप में हुआ था। इनका बचपन का नाम महावीर था। मात्र 19वर्ष की अवस्था में संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज से दीक्षित होकर सदा के लिए अपने गुरु के साथ रहने लगे। 40 वर्षों तक अपने गुरु महर्षि मेँहीँ की सेवा कर अनुपम गुरु भक्ति का आदर्श उदाहरण संत साहित्य में पेश किया। इनकी सेवा से प्रसन्न होकर गुरुदेव महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने कहा था कि "संतसेवी जी, आपकी तपस्या मेरी सेवा है। मेरे बिना आप नहीं रह सकते और आपके बिना मुझको नहीं बनेगा। मैं वरदान देता हूँ कि जहाँ मैं रहूंगा वहाँ आप रहेंगे ।आप मेरे मस्तिष्क हैं।"गुरु सेवा के कारण महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने इनका नाम महावीर से ‘संतसेवी ‘ रखा और कालांतर में वे इसी नाम से विश्व विख्यात हुए। इनकी आध्यात्मिक रचनाएँ -योग माहात्म्य, ॐविवेचन, जग में ऐसे रहना, गुरु महिमा, सत्य क्या है?, सुख दुःख, सुषुम्ना ध्यान, त्रितापों से मुक्ति, एक गुप्त मत, सर्वधर्म समन्वय संतमत, साधना में सफलता कैसे?, प्रवचन पीयूष आदि ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। आपकी गुरु भक्ति, तपस्या साधना, ज्ञान वैराग्य की गरिमा को देखकर 1997ई. में ऋषिकेश में आयोजित महाधिवेशन के मौके पर देश विदेश के धर्माचार्यों और महामंडलेश्वरों ने आपको जगदगुरु महर्षि परमहंस की उपाधि से विभूषित किया । 86 वर्ष की अवस्था में 4जून 2007 को संतमत के केंद्रीय आश्रम महर्षि मेँहीँ आश्रम कुप्पाघाट, भागलपुर में लाखों भक्तों को छोड़कर दैहिक लीला समाप्त कर परम् निर्वाण को प्राप्त हुए। इनका उपदेश लोककल्याण, परोपकार, मानवता, समरसता, सर्वधर्म समन्वय के लिए है। नर तन की उपयोगिता विषय भोगों की बहुलता में नहीं, भगवद् भजन की मादकता में है। दुर्बल को सताओ नहीं, दूसरों का हक अपनाओ नहीं, अन्यथा परिणाम भयंकर होगा। इनका अंतिम उपदेश था -जीनव थोड़ा है। शरीर नश्वर है। मृत्यु निश्चित है। पता नहीं कब कहाँ और किस प्रकार वह आ जाय। शरीर छूटने पर यहाँ शरीर को चिता की अग्नि में जलाया जाएगा और परलोक में नरक की अग्नि में जीव को जलाया जाएगा। इसलिए खबरदार रहना। जो भजन नहीं करता, उसके लिए मृत्यु बड़ी कष्टदायिनी होती है उसे यम कूटते हैं और लूटते हैं। यह दुर्लभ शरीर मिला है। माया के छलावे में मत पड़ना। इस अवसर पर आश्रमवासी सिपाही बाबा, स्वामी महेंदर बाबा, नकूल बाबा ,कमल बाबा, पूर्व मेजर आर पी पंडित आदि मौजूद थे। हिन्दुस्थान समाचार/डॉ सुमन/विभाकर

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