नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। पूरी दुनिया के लिहाज से 2024 को चुनावों का साल कहें तो गलत नहीं होगा। 2024 में करीब 70 देशों में चुनाव हो रहा हैं। कहीं चुनाव हो चुके हैं, तो कहीं चुनाव हो रहें हैं। साल 2024 पूरी दुनिया में राजनीतिक बदलावों के लिए भी जाना जाने वाला है। क्योंकि इस बार के चुनावों में दुनिया के बड़े प्रभावसाली देशों में राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल सकता हैं।
इस साल हो रहें चुनावों में पूरी दुनिया में दिख रहा राइट विंग पार्टियों का दबदबा
इस साल हो रहें चुनावों में पूरी दुनिया में राइट विंग पार्टियों का दबदबा देखने को मिला हैं। इसी साल मतदान के लिहाज से दुनिया के सबसे बड़े चुनाव समझे जाने वाले भारत और यूरोपीय यूनियन के चुनाव भी खत्म हुए हैं। यूरोपीय यूनियन के चुनाव में सेंटरिस्ट पार्टियों के हाथ से सत्ता राइट विंग पार्टियों के पास आ गई हैं, तो वहीं भारत में प्रधानमंत्री मोदी लगातार तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने में कमयाब हुए हैं।
साल 2024 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में भी चुनाव
साल 2024 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में भी चुनाव हो रहें हैं। इन चुनावों में भी राजनीतिक बदलाव के संकेत सामने आ रहें है। चुनाव के बाद होने वाले इन बदलावों की तरफ पूरी दुनिया की नजर हैं। बड़े देशों में होने वाले बदलावों पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई हैं। क्योंकि इन देशों का नेतृत्व पूरी दुनिया में व्यापार, जंग, इमिग्रेशन, मानव सहायता आदि जैसे मुद्दे पर प्रभाव डालता है। इन देशों के साथ इस साल ईरान में चुनाव का शोर है, और वहां की जनता भी धार्मिक कट्टरता और महिला विरोधी कानूनों से अलग दिखने वाली सरकार की तरफ झुकती दिख रही हैं।
अमेरिका के चुनाव में हो सकती है ट्रंप की वापसी
2024 के चुनावी समर में फ्रांस और अमेरिका भी दावा ठोक रहें है। अमेरिका में 2020 में ट्रंप को को हरा कर जो बाइडेन ने सत्ता संभाली थी। उस समय ट्रंप की हार के लिए अफगान से सेना की वापसी और कोराना काल में खराब मैनेजमेंट बड़ा मुद्दा बन गया था जिसने बाइडेन को बड़ी राहत दे दी थी। उसके कुछ सालों बाद से लगातार अमेरिका में बाइडेन खिलाफ एक माहौल बनता दिख रहा है। बाइडेन की बढ़ती उम्र और गाजा, यूक्रेन युद्ध में उनकी नाकामी ने इस चुनाव में ट्रंप के लिए कारगर साबित होते दिख रहे हैं। हाल में आई WSJ की रिपोर्ट से पता चला है कि डोनाल्ड ट्रंप ने पहली राष्ट्रपति बहस के बाद बाइडेन पर लीड बना ली है। और अमेरिका में कई लोगों का मानना है कि बाइडेन की बढ़ती उम्र उनके नेतृत्व करने मे बाधा बन रही हैं। अमेरिका में ट्रंप को एक दक्षिणपंथी सोच का नेता माना जाता रहा है जो प्रवासियों के लिए सख्त रुख रखते हैं। इस चुनाव में उन्हें अमेरिका का नेतृत्व करने के लिए मजबूत दावेदार भी समझा जा रहा है।
फ्रांस के चुनाव में हो सकता है राजनीतिक उलट फेर
वहीं इस बार के चुनाव में फ्रांस की राजनीति में भी उलट फेर की संभावना नजर आ रहीं है। फ्रांस में हुए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई दक्षिणपंथी पार्टी सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है। पहले राउंड के नतीजों में राइट विंग पार्टी नेशनल रैली 33.1 % वोटों के साथ पहले नंबर बनी है। तो वहीं फ्रांस वर्तमान राष्ट्रपति मैक्रों की पार्टी रेनासेंस 20.7 फीसदी वोट के साथ तीसरे स्थान पर जाती दिख रहीं है। इस बार के चुनाव को देख कर ऐसा लग रहा है कि फ्रांस की जनता ने इस बार मैक्रों की जगह नेशनल रैली के चीफ ले पेन को अपना अगला नेता चुनने जा रहीं है।
ब्रिटेन में दिख रहा वामपंथ का वर्चस्व
इसके साथ ब्रिटेन के चुनाव में इस बार वामपंथ का वर्चस्व नजर आ रहा है। यहां पर हुए चुनाव में भारतीय मूल के पीएम ऋषि सुनक से भारतीय समुदाय के साथ स्थानीय लोग भी नाखुश दिखें। चुकी ब्रिटेन के चुनाव में सरकार बनाने में भारतवंशीयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, ऐसे में ऋषि सुनक से भारतीय समुदाय की नाराजगी उनके चुनाव के लिए भारी साबित हुई। वहीं वामपंथी विचार वाले केर स्टार्मर इस चुनाव में जनता को खूब पसंद आ रहे हैं, और करीब 14 साल बार लेबर पार्टी सत्ता में वापसी कर रहीं है। ऋषि की कई योजनाओं के कारण उनके एशियाई वोटर्स उनसे खिलाफ हो गए हैं। ब्रिटेन के चुनाव में भारी उलट फेर देखने को मिला यहां लेबर पार्टी ने 400 सीटों से ज्यादा पर जीत दर्ज कर इतीहास बना दिया।
ईरान की जनता ने चुना उदारवादी नेता को अपना राष्ट्रपति
इसके साथ ही इस बार के चुनाव में ईरान की जनता ने भी उदारवादी नेता को अपना राष्ट्रपति बनाने का निर्णय ले लिया है। इरान में राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत के बाद 28 जून को हुए मतदान में उदारवादी नेता मसूद पेजेशकियन ने 10.4 मिलियन यानी 42 फीसद वोट हासिल किए हैं। वहीं इस चुनाव में कट्टरपंथी नेता सईद जलीली को महज 9.4 मिलियन यानी 38.6 फीसद वोट ही मिले थे। इसके बाद रन ऑफ राउंड में भी मसूद पेजेशकियन ने जीत हासिल की। इनकी इस जीत को मध्य पूर्व में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। क्योंकि मसूद पेजेशकियन पश्चिमी देशों के साथ बातचीत करने के हिमायत माने जाते हैं।
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