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हमें सांस्कृतिक आत्मविश्वास पर डटे रहना चाहिए

बीजिंग, 20 मई (आईएएनएस)। चीन और भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं के लिए संस्कृति हमारे दिलों की शाश्वत निर्भरता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर जी ने वर्ष 1924 में चीन का दौरा करते हुए कहा था, मैं ईमानदारी से सभी से आग्रह करता हूं कि वे अश्लील शक्ति, बिना अंत के धन संचय करने की इच्छा के प्रलोभन में न आएं। टैगोर जी यह जानते थे कि चाहे शक्तिशाली सैन्य बल हो, या स्टील और रेलवे जैसी भौतिक सभ्यताएं हो, वे सभी अस्थायी और अल्पकालिक हैं। उधर पूर्वी देशों की संस्कृति ही शाश्वत आध्यात्मिक धन है। ब्रिटिश दार्शनिक बट्र्रेंड आर्थर विलियम रसेल भी एक बार चीन की यात्रा पर आए थे। उस समय चीन गरीब और कमजोर था और सम्राज्यवादी उत्पीड़न से ग्रस्त रहता था। रसेल ने कहा, चीनी लोगों को विश्वास है कि उनका राष्ट्र दुनिया का सबसे महान राष्ट्र है, और चीनी सभ्यता सबसे महान सभ्यता है। लेकिन, यह भी सच है कि अब तक ऐसे कुछ लोग भी हैं जो पश्चिमी भौतिक सभ्यता के सामने आत्मविश्वास नहीं रखते हैं। इतिहास में उभरी प्राचीन मिस्र और प्राचीन बेबीलोन जैसी कई सभ्यताएं रही थीं। लेकिन संस्कृत द्वारा प्रस्तुत भारतीय सभ्यता, तथा चीनी शब्दों से आधारित चीनी सभ्यता आज तक जीवित रह रही हैं। भारतीय स्कूलों में छात्र अभी भी वेद पढ़ते हैं, जबकि चीनी लोग अभी भी कन्फ्यूशियस के लेखन सीखते हैं, और हम अभी भी प्राचीन संस्कृति से आध्यात्मिक पोषण प्राप्त कर रहे हैं। दार्शनिक चिंतन के अलावा प्राचीन भारत और प्राचीन चीन ने खगोल विज्ञान, गणित आदि में भी अनगिनत उपलब्धियां हासिल की थीं और मानव सभ्यता के लिए अमिट योगदान दिया था। लेकिन पश्चिमी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ने पूर्वी संस्कृति को बहुत हद तक नष्ट किया। सांस्कृतिक विनाश के बारे में चिंता आधारहीन नहीं है। हमारे पास ऐसे अनेक युवा लोग हैं, जो अंग्रेजी भाषा बोलना पसंद करते हैं, पर अपनी राष्ट्रीय भाषाओं का तिरस्कार करते हैं। यह सांस्कृतिक उदासीनता की अभिव्यक्ति है। ब्रिटिश इतिहासकार जोसेफ नीधम ने अपनी उत्कृष्ट कृति चीन में विज्ञान और सभ्यता में बताया कि यूरोप में विज्ञान के पुनर्जागरण से पहले, चीन का दुनिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इतिहास में एक प्रमुख स्थान था, और दुनिया में इसका योगदान कहीं अधिक था। उधर अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट टेम्पल ने भी बताया कि आधे से अधिक बुनियादी आविष्कार और खोजें जिन पर आधुनिक दुनिया का निर्माण किया गया था, वे चीन से उत्पन्न हो सकते हैं। पूर्वी देशों ने इतिहास में सबसे पहले कृषि और हस्तशिल्प का विकास किया था, और उनके पास कई महान विचारक, वैज्ञानिक, आविष्कारक, राजनेता, सैन्य रणनीतिकार, लेखक और कलाकार पैदा हुए थे, और उनके समृद्ध सांस्कृतिक क्लासिक्स भी हैं। चीनी अक्षरों और भारत की संस्कृत का हजारों वर्षों का इतिहास है। मनुष्य और ब्रह्मांड के बीच संबंधों पर पूर्वी सभ्यता की सोच अभी भी मानव जाति के भावी विकास की दिशा का मार्गदर्शन करती रहती है। मानव जाति के भविष्य के विकास को पूर्वी दर्शन में पाया जाना चाहिए। यह प्रसिद्ध चीनी विद्वान ची श्यैनलीन द्वारा किया गया एक निष्कर्ष है। पूर्वी संस्कृति इस बात पर जोर देती है कि विज्ञान के साथ कला होनी चाहिए, और मनुष्यों को प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना चाहिए। केवल इसी तरह से मानव औद्योगिक सभ्यता की उपलब्धियों का आनंद लेते हुए पर्यावरण प्रदूषण, पारिस्थितिक क्षति और ऊर्जा की कमी और यहां तक कि परमाणु युद्ध और जैव रासायनिक युद्ध से बच सकेंगे। जैसे-जैसे पश्चिमी राष्ट्र विनाश की ओर राह पर चल रहे हैं, उन्हें पीछे मुड़कर पूर्व के कन्फ्यूशियस और शाक्यमुनि से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। (साभार---चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) --आईएएनएस एएनएम

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