नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। अमेरिकी इंजीनियरों के ए ग्रुप ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस (TCS) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। इस ग्रुप का दावा है कि कंपनी अमेरिकी इंजीनियरों को काम से निकालकर उनकी जगह पर भारतीय इंजीनियरों को H-1B वीज़ा दिलवाकर रखा जा रहा है।
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, इन इंजीनियर्स का कहना है कि उन्हें शॉर्ट नोटिस पर नौकरी से निकाल दिया गया और उनकी जगह भारतीयों को रख लिया गया।
TCS पर क्या आरोप हैं?
TCS के 22 पूर्व कर्मचारियों ने कंपनी पर आरोप लगाया है कि उनके साथ नस्ल और उम्र के आधार पर भेदभाव किया गया। ये कर्मचारी अलग-अलग एथनिसिटी के हैं और इनकी उम्र 40 से 60 के बीच है। इनका आरोप है कि TCS ने शॉर्ट नोटिस पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया और उनकी जगह पर कम तनख्वाह वाले भारतीय इमिग्रेंट्स को नौकरी दे दी।
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस पर लिखा है, “एक तरफ जहां कंपनियों के लेऑफ का नुकसान ज्यादातर सीनियर कर्मचारियों को होता है, वहीं अमेरकन प्रोफेशनल्स का कहना है कि TCS ने उन्हें नस्ल और उम्र के आधार पर टारगेट करके कानून का उल्लंघन किया है।”
आरोप पर TCS ने क्या जवाब दिया
इन आरोपों को TCS ने आधारहीन बताते हुए कहा है कि कंपनी ने कभी भेदभाव नहीं या है। कंपनी के एक स्पोक्सपर्सन ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा, “TCS के पास ये साबित करने के लिए मजबूत दस्तावेज हैं कि कंपनी अमेरिका में एक इक्वल अपॉर्चुनिटी एम्प्लॉयर है। कंपनी अपने ऑपरेशंस में पूरी ईमानदारी बरतती है।”
क्या है H-1B वीज़ा
H-1B वीज़ा अमेरिका जारी करता है। ये उन्हीं विदेशी नागरिकों को मिलता है जिनके पास टेक्निकल एक्सपर्टीज़ होती है। ये वीज़ा मिलने के बाद अमेरिका में तीन से छह साल तक काम किया जा सकता है। इसके साथ ही ये वीज़ा रिन्यू भी किया जा सकता है या फिर ग्रीन कार्ड प्रोसेस से H1-B वीज़ा धारकों परमानेंट रेसिडेंस भी दे दिया जाता है।
H-1B वीज़ा सिस्टम के तहत हर साल 65 हजार वीज़ा जारी किए जाते हैं। इनके साथ ही 20 हजार वीज़ा ऐसे लोगों हर साल जारी किए जाते हैं जिनके पास अमेरिकी इंस्टीट्यूट्स की एडवांस्ड डिग्री होती है।




