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अमेरिकी दोहरे मापदंडों के पीछे छिपा हुआ पाखंड

बीजिंग, 27 मई (आईएएनएस)। हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने वर्ष 2020 अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक मुक्ति नामक एक रिपोर्ट जारी की, और इसके बहाने एक चीनी अधिकारी पर प्रतिबंध लगाया। इस के प्रति चीनी विदेश मंत्रालय ने फौरन प्रतिक्रिया दी। प्रवक्ता चाओ लीचेन ने 26 मई को कहा कि अमेरिका की तथाकथित रिपोर्ट में वास्तविकता की उपेक्षा करके वैचारिक पूर्वाग्रह भरा हुआ है। अमेरिका ने चीन की धार्मिक नीति की बदनामी की, और गंभीर रूप से चीन के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया। चीन इस का कड़ा विरोध करता है। वास्तव में हर बार जब अमेरिका ने इस तरह की रिपोर्ट जारी की, तो विश्व के लोगों के सामने उसने अपना पाखंड व दोहरा मापदंड दिखाया है। सही बात यह है कि अमेरिका में अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्थिति वाकई चिंताजनक ही है। अमेरिका में दीर्घकालीन व प्रणालीगत नस्लीय भेदभाव मौजूद है। गैलप और प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा जारी जनमत संग्रहण आंकड़ों के अनुसार 75 प्रतिशत अमेरिकी मुसलमानों के विचार में अमेरिकी समाज में मुसलमानों के साथ गंभीर भेदभाव होता है। और कुछ खुले आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में मस्जिदों की कुल संख्या केवल चीन के शिनच्यांग उइगुर स्वायत्त प्रदेश में स्थित मस्जिदों की संख्या के दसवें हिस्से से भी कम है। इसके अलावा अफ्ऱीकी अमेरिकी फ्रायड की मौत से अमेरिका में बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शन व परेड ने भी इस समस्या को गहराई से दर्शाया है। ध्यानाकर्षक बात यह है कि दोहरा मापदंड हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय मामलों में कुछ अमेरिकी राजनीतिज्ञों की चाल है। उन की नजर में अमेरिका को सभी नीति-नियमों से ऊपर होना चाहिये। मापदंड केवल दूसरे देशों में प्रयोग करना चाहिये, जिसका अमेरिकी लोगों से कोई संबंध नहीं है। इसलिये अमेरिका बार-बार दोहरे मापदंडों से दूसरे देशों के साथ व्यवहार करता है। अब हम सिलसिलेवार वास्तविकता से अमेरिकी दोहरे मापदंडों का विवरण करते हैं। वर्ष 2021 में 1 जून को अमेरिका में कैपिटल हिल पर हमले की दुर्घटना हुई। उसी समय बड़े खेप वाले प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रूप से अमेरिकी संसद भवन पर हमला किया। यहां तक कि कुछ लोग संसद भवन में घुसने में सफल रहे। प्रदर्शनकारियों के साथ मुठभेड़ों में पुलिसकर्मियों ने खुले तौर पर गोली चलायी। जिससे घटनास्थल पर एक महिला प्रदर्शनकारी को गोली से मार डाला गया। बाद में सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। इस दुर्घटना के प्रति अमेरिकी सरकार ने कड़ी सजा दी, और इसे घरेलू आतंकवाद माना। सभी प्रदर्शनकारियों को ठग कहा गया। उधर वर्ष 2019 के जून में चीन के हांगकांग में हुए दंगों में हांगकांग के ठगों ने सबवे, हवाई अड्डे और सड़कों को अवरुद्ध किया, हांगकांग के पुलिसकर्मियों पर हिंसक हमला किया, सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट कर दिया, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान किया, और पत्रकारों और पर्यटकों पर हमला किया। उन्होंने गंभीर रूप से हांगकांग समाज की स्थिरता व विकास को बर्बाद किया। लेकिन अमेरिका ने उन हिंसकों को तथाकथित मुक्ति व लोकतंत्र के रक्षक व वीर कहा। साथ ही अमेरिका ने हांगकांग पुलिस की कानूनी कार्रवाई की आलोचना की, और चीन सरकार द्वारा अंदरूनी मामलों के प्रबंध को मानवाधिकार का उल्लंघन कहा। उक्त दोनों दुर्घटनाओं को देखकर अमेरिकी दोहरे मापदंडों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। एक और उदाहरण यह है कि अमेरिका हमेशा से प्रभुत्ववादी रुख से अन्य देशों के सैन्य आधुनिक विकास को देखता है। अमेरिका ने अपने देश की सैन्य श्रेष्ठता का विकास करने के लिये बड़े पैमाने का संसाधन किया है। स्वीडन के स्टॉकहोम अंतर्राष्ट्रीय शांति अनुसंधान प्रतिष्ठान द्वारा जारी वर्ष 2020 वैश्विक सैन्य व्यय रिपोर्ट में यह जाहिर हुआ है कि अमेरिका, जिस का सैन्य व्यय विश्व में सब से बड़ा है, वर्ष 2020 का सैन्य व्यय वर्ष 2019 से 4.4 प्रतिशत अधिक रहा। जो 7 खरब 78 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी का प्रकोप विश्व में हुआ, लेकिन वह भी अमेरिका के सैन्य विकास के कदम को रोक नहीं सका। लेकिन अमेरिका को हमेशा से चीनी सेना के विकास से चिंता होती है। हर वर्ष अमेरिकी पेनतागन चीन की सैन्य शक्ति पर एक श्वेत पत्र जारी करता है, और चीनी धमकी सिद्धांत को फैलाता है। उदाहरण के लिये विदेशों में अमेरिका के पांच सौ से अधिक सैन्य ठिकाने होते हैं, लेकिन उसने अपनी रिपोर्ट में यह अफवाह फैलायी है कि चीन विदेशों में सैन्य ठिकानों का निर्माण करने की कोशिश कर रहा है। इस के प्रति चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बार-बार इस बात पर बल दिया कि चीन शांतिपूर्ण विकास के रास्ते पर कायम रहता है। चीन आत्म निर्भर बनकर अपनी राष्ट्रीय स्थिति के अनुकूल रक्षा शक्ति का विकास करता है। जिस का उद्देश्य अपनी प्रभुसत्ता, सुरक्षा व विकास से प्राप्त लाभ की रक्षा करना, और विश्व व क्षेत्रीय शांति व स्थिरता की रक्षा करना है। इसके अलावा अमेरिका ने एक तरफ अपने देश के लिये बहुत सब्सिडी नीतियां तैयार कीं, दूसरी तरफ वह अन्य देशों में बराबर नीतियों का विरोध करता है। आर्थिक व व्यापारिक क्षेत्रों में अमेरिका ने निरंतर रूप से अन्य देशों की व्यवसाय नीति की आलोचना की। उस के विचार में सरकार से मिली सब्सिडी ने बाजार अर्थव्यवस्था के नीति-नियमों का विरोध किया। जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में हानि पहुंची। खास तौर पर चीन-अमेरिका व्यापार संघर्षों में अमेरिका ने बार-बार चीन को उच्च तकनीकी व्यवसायों में नीति सहायता देने का आरोप लगाया, और टैरिफ बढ़ाने से चीन को धमकी दी। ताकि चीन विवश होकर व्यावसायिक सब्सिडी को छोड़ सके। लेकिन अपने देश के लिये अमेरिका ने सिलसिलेवार व्यावसायिक सब्सिडी को लागू किया है। जिस के दोहरे मापदंड बहुत स्पष्ट हैं। (चंद्रिमा - चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग) --आईएएनएस एएनएम

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