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वास्तविक समानता के ज़रिये ही, निर्धनता के दुष्चक्र का अन्त सम्भव

संयुक्त राष्ट्र के एक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ ने कहा है कि देशों व समाजों में निर्धनता और विशेषाधिकार के दुष्चक्र जारी हैं, मगर रोकथाम प्रयासों व मौजूदा प्रतिमानों (paradigms) में बदलाव के ज़रिये, और असलियत में समानता सुनिश्चित करके, इन चक्रों को तोड़ा जा सकता है. अत्यधिक निर्धनता और मानवाधिकारों पर यूएन के विशेष रैपोर्टेयर ओलिविएर दे शटर ने बुधवार को यूएन महासभा में अपनी रिपोर्ट, The persistence of poverty: how real equality can break the vicious cycle, पेश की है. Poverty and privilege continue to reproduce themselves in vicious cycles, driven by unacceptable levels of inequality – @srpoverty: "Governments must act now before another generation is condemned to the same fate as their parents" 👉https://t.co/GvvGOu62W9 #UNGA76 #EndPoverty pic.twitter.com/AUZWHjcWHN — UN Special Procedures (@UN_SPExperts) October 20, 2021 उन्होंने सचेत किया कि सदियों से चली आ रही और गहराई तक समाई असमानता का अन्त, राजनैतिक इच्छाशक्ति के साथ, करना सम्भव है. इसके ज़रिये भाग्य पर निर्भरता से अवसर की दिशा में बढ़ा जा सकता है. विशेष रैपोर्टेयर शटर के मुताबिक़, लाभ और नुक़सान के चक्र को तोड़ने के लिये इन अहम घटकों की आवश्यकता होगी: बचपन में जल्द निवेश, समावेशी शिक्षा को बढ़ावा, युवा वयस्कों को उत्तराधिकार करके ज़रिये एक बुनियादी आय और ग़रीबों के ख़िलाफ़ भेदभाव का अन्त. उन्होंने माना कि अनेक देशों ने सामाजिक गतिशीलता के उच्च स्तर हासिल किये हैं और यह उनके लिये गर्व का विषय है. मगर, उन्होंने ध्यान दिलाया कि शीर्ष स्तर पर विशेषाधिकार का बोलबाला और निचले स्तर पर लोगों को वंचित रखा जाना भी एक आम बात और सच्चाई है. बुधवार को पेश की गई रिपोर्ट में आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के सदस्य देशों से आँकड़े जुटाए गए हैं. रिपोर्ट दर्शाती है कि निम्न-आय वाले घरों में बच्चों को अपने देश में औसत आय पाने के लिये चार से पाँच पीढ़ियों का समय लगता है. ब्राज़ील, कोलम्बिया या दक्षिण अफ़्रीका जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में यह हासिल करने में 9 या उससे भी ज़्यादा पीढ़ियों का समय लग सकता है. “OECD देशों में शीर्ष के 10 फ़ीसदी लोगों का कुल सम्पदा के 52 प्रतिशत पर नियंत्रण है, जबकि निचले 60 प्रतिशत लोगों के पास महज़ 12 प्रतिशत ही हिस्सा है, जिससे ग़रीब लोग, निर्धनता भरा जीवन गुज़ारने के लिये मजबूर हैं.” समय बीतने के साथ कठिनाई बताया गया है कि स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और रोज़गारों के क्षेत्र में निर्धनता पनपने के बाद बनी रहती है, और अक्सर वंचित परिवारों में पैदा होने वाले बच्चों के लिये, समान अवसर उपलब्ध नहीं हो पाते हैं. “निर्धन परिवारों में पैदा होने वाले बच्चों के पास, बेहतर हालात वाले घर-परिवारों की तुलना में, स्वास्थ्य देखभाल, उपयुक्त व शिष्ट आवास, गुणवत्तपूर्ण शिक्षा और रोज़गार सुलभता कम होती है.” “इससे निर्धनता के जाल से मुक्त होने के लिये उनकी सम्भावनाएँ नाटकीय रूप से कम हो जाती हैं.” उन्होंने मौजूदा हालात को दुखदाई बताते हुए ध्यान दिलाया कि कभी ग़रीब ना रहने वाले परिवारों की तुलना में, एक निर्धन परिवार में पैदा होने वाले बच्चों के, 30 वर्ष की उम्र तक निर्धनता में जीवन गुज़ारने की सम्भावना तीन गुना अधिक है. निर्धनता की क़ीमत यूएन के स्वतंत्र विशेषज्ञ ने क्षोभ जताया कि बाल निर्धनता, मानवाधिकारों का हनन है और नैतिक आधार पर नितान्त अनुचित भी है. साथ ही यह महंगा भी है. उदाहरणस्वरूप, अमेरिका में बाल निर्धनता की वार्षिक क़ीमत एक हज़ार अरब डॉलर है, जोकि सकल घरेलू उत्पाद का 5.4 प्रतिशत है. निर्धनता को घटाने के लिये प्रति डॉलर निवेश के ज़रिये सात डॉलर की बचत की जा सकती है. उन्होंने कहा कि उस मिथक को तोड़े जाने की ज़रूरत है जिसमें विषमता को, ज़्यादा मेहनत करने के प्रोत्साहन के रूप में देखा जाता है. यूएन विशेषज्ञ के मुताबिक़ वास्तविकता इसके उलट है, विषमता से सामाजिक गतिशीलता कम होती है, दशकों से व्याप्त लाभ व रास्ते की बाधाएँ और गहरी होती हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे को निर्धनता में पैदा होने का दण्ड नहीं मिलना चाहिये और कि ग़रीबी की स्थिति, किसी व्यक्ति की नहीं बल्कि समाज की विफलता है. इस क्रम में उन्होंने, देशों की सरकारों से कार्रवाई किये जाने का आहवान किया है ताकि भावी पीढ़ियों को उन्हीं हालात में जीवन गुज़ारने से रोका जा सके, जिसमें उनके अभिभावकों ने ज़िन्दगी गुज़ारी है. स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिये कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं. --संयुक्त राष्ट्र समाचार/UN News

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