नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। आज जब पूरी दुनिया आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है, तब भारत एक मजबूत और स्थिर अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। वहीं, अमेरिका जो कभी वैश्विक आर्थिक शक्ति का प्रतीक माना जाता था, अब भारी कर्ज़ और गिरती साख के कारण चिंता का विषय बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वो कर दिखाया है, जो आज दुनिया के बड़े-बड़े देशों से नहीं हो पा रहा। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका पर अस्थिरता और आर्थिक दबाव बढ़ते जा रहे हैं।
रेटिंग एजेंसियों ने अमेरिका की हालत पर जताई चिंता
तीन प्रमुख वैश्विक संस्थानों ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जाहिर की है मूडीज (Moody’s) ने 100 साल में पहली बार अमेरिका की सॉवरेन रेटिंग को Aaa से घटाकर Aa1 कर दिया। फिच (Fitch) ने 2023 में ही अमेरिका की रेटिंग कम कर दी थी। आईएमएफ (IMF) ने चेतावनी दी है कि अमेरिका पर कर्ज का बोझ उसकी विकास दर से तेज़ी से बढ़ रहा है, जो भविष्य में संकट खड़ा कर सकता है।
भारत बनाम अमेरिका: कर्ज का बोझ किस पर भारी?
जहां अमेरिका पर 117% कर्ज है, वहीं भारत पर सिर्फ 81% है। भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2031 तक इसे घटाकर 51% पर ले आया जाए। राजकोषीय घाटा यानी सरकार की कमाई और खर्च में अंतर एक देश की आर्थिक सेहत का बड़ा संकेतक होता है। भारत जनवरी 2025 तक 11.70 लाख करोड़ घाटा, जो GDP का 4.8% है। अमेरिका दिसंबर 2024 तक 154 लाख करोड़ घाटा, जो GDP का करीब 7% है। इससे साफ है कि भारत का वित्तीय संतुलन अमेरिका से कहीं बेहतर और नियंत्रित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक नीतियों और वित्तीय अनुशासन की बदौलत भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है। विदेशी निवेश के लिए भरोसेमंद जगह बन चुका है। बजट घाटे और कर्ज को नियंत्रण में रखे हुए है। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका में नीतिगत अस्थिरता और राजनीतिक असहमति के चलते अर्थव्यवस्था का संतुलन बिगड़ रहा है। जहां अमेरिका की अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया भर में चिंता है, वहीं भारत आशा और स्थिरता का प्रतीक बनकर उभरा है। पीएम मोदी ने कर्ज और खर्च के मामले में डोनाल्ड ट्रंप को पीछे छोड़ दिया है, और दुनिया अब भारत की आर्थिक मजबूती और नेतृत्व क्षमता को गंभीरता से ले रही है।





