नई दिल्ली,रफ्तार डेस्क। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति Donald Trump को बड़ा झटका देते हुए उनके द्वारा लगाए गए टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया। इस मामले में भारतीय मूल के वकील Neal Katyal ने ट्रंप के अधिकारों को कोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने कत्याल की दलीलों को सही माना।
कौन हैं नील कत्याल?
नील कत्याल भारतीय मूल के अमेरिकी वकील हैं। उनका जन्म अमेरिका के शिकागो शहर में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका गए थे। पिता इंजीनियर और मां डॉक्टर हैं। उन्होंने डार्टमाउथ कॉलेज और येल लॉ स्कूल से पढ़ाई की। वे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज स्टीफन ब्रेयर के क्लर्क भी रह चुके हैं। साल 2010 में पूर्व राष्ट्रपति Barack Obama ने उन्हें अमेरिका का कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया था। वर्तमान में वे मिलबैंक एलएलपी में पार्टनर हैं और जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी लॉ सेंटर में प्रोफेसर हैं। उन्होंने अब तक सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा बड़े मामलों में पैरवी की है।
टैरिफ मामले में क्या था विवाद?
राष्ट्रपति ट्रंप ने 1977 के International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) के तहत इमरजेंसी अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए कुछ टैरिफ लगाए थे। नील कत्याल ने कोर्ट में तर्क दिया कि IEEPA कानून में “टैरिफ” या “टैक्स” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। अमेरिकी संविधान के अनुसार टैक्स लगाने और व्यापार को नियंत्रित करने की शक्ति कांग्रेस (संसद) के पास है। राष्ट्रपति मनमाने तरीके से टैक्स नहीं लगा सकते। कोर्ट ने इन दलीलों को सही माना और कहा कि राष्ट्रपति एकतरफा तरीके से टैक्स नहीं बदल सकते।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या बोले कत्याल?
फैसले के बाद नील कत्याल ने इसे एक संवैधानिक मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा,“US सुप्रीम कोर्ट ने हमें वह सब कुछ दिया जो हमने अपने कानूनी मामले में मांगा था। सब कुछ। यह फैसला राष्ट्रपति के बारे में नहीं, बल्कि राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा के बारे में है। यह शक्ति के बंटवारे और संविधान की रक्षा से जुड़ा मामला था। उन्होंने यह भी कहा कि 250 वर्षों से अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र की नींव रहा है और उसने देश के बुनियादी मूल्यों की रक्षा की है। नील कत्याल पहले भी कई बड़े मामलों में ट्रंप के खिलाफ खड़े हो चुके हैं। 2017 में उन्होंने ट्रंप के ट्रैवल बैन को चुनौती दी थी। 1965 के Voting Rights Act का बचाव किया था।





