नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत के लिए 2026 का BAFTA अवॉर्ड समारोह बेहद खास रहा, जब मणिपुरी भाषा की फिल्म ‘बूंग’ ने बेस्ट चिल्ड्रन एंड फैमिली फिल्म का अवॉर्ड जीतकर पूरे देश का नाम रोशन किया। यह इस साल भारत के लिए पहला BAFTA अवॉर्ड है।
वैश्विक मंच पर गौरव दिलाया।
फरहान अख्तर के प्रोडक्शन सपोर्ट में बनी यह इमोशनल ड्रामा फिल्म ने आर्को, लिलो एंड स्टिच और ज़ूट्रोपोलिस 2 जैसी अंतरराष्ट्रीय नॉमिनीज़ को पीछे छोड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की। इस जीत ने न केवल भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, बल्कि विशेषकर नॉर्थईस्ट की फिल्मों को वैश्विक मंच पर गौरव दिलाया।फरहान अख्तर अपनी पत्नी शिबानी दांडेकर के साथ इस सेरेमनी में शामिल हुए, जो इस पल को और भी यादगार बना गया।
‘बूंग’ की कहानी: छोटा लड़का, बड़ी उम्मीदें
‘बूंग’ लक्ष्मीप्रिया देवी के निर्देशन में बनी है। फिल्म एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो मणिपुर के सामाजिक और राजनीतिक तनाव के बीच अपने परिवार को फिर से जोड़ना चाहता है।
मुख्य किरदार: बूंग (गुगुन किपगेन)
मां का रोल: मंदाकिनी (बाला हिजाम)
सबसे अच्छा दोस्त: राजू (अंगोम सनामातुम)
कहानी में बूंग का मानना है कि अपने खोए हुए पिता को घर लाने से उसकी मां फिर से खुश हो जाएंगी। अपने दोस्त राजू की मदद से बूंग बॉर्डर वाले शहर मोरेह जाता है और अपने पिता की तलाश में म्यांमार भी जाता है। फिल्म में पारिवारिक भावनाओं, दोस्ती और सामाजिक संघर्ष को बड़े संवेदनशील और रीयलिस्टिक अंदाज में दिखाया गया है।
फिल्म का नाम मणिपुरी में छोटा लड़का के अर्थ में है, और यह लड़के की मासूमियत, साहस और परिवार के प्रति उसके समर्पण को दर्शाता है।
नॉर्थईस्ट सिनेमा की अंतरराष्ट्रीय पहचान
‘बूंग’ की जीत भारतीय सिनेमा के लिए गर्व का पल है, खासकर नॉर्थईस्ट की फिल्मों के लिए। यह साबित करता है कि भारत के छोटे इलाकों की सीधी-सादी, सच्ची कहानियां भी दुनिया भर के दर्शकों से गहराई से जुड़ सकती हैं।
फरहान अख्तर के प्रोडक्शन सपोर्ट और लक्ष्मीप्रिया देवी के निर्देशन ने फिल्म को एक वैश्विक पहचान दिलाई। इससे नॉर्थईस्ट सिनेमा को नई दिशा और अवसर मिलेंगे।
यह जीत भारतीय सिनेमा के लिए ऐतिहासिक पल है।
‘बूंग’ की यह जीत भारतीय सिनेमा के लिए ऐतिहासिक पल है। यह दिखाता है कि भावनात्मक, संवेदनशील और सच्ची कहानियां सीमाओं को पार कर सकती हैं। फरहान अख्तर और लक्ष्मीप्रिया देवी की मेहनत ने मणिपुरी सिनेमा को वैश्विक मंच पर मान्यता दिलाई और भारत के छोटे राज्यों की फिल्म इंडस्ट्री के लिए उम्मीद की किरण जगाई। इस जीत से यह संदेश भी जाता है कि छोटे बजट और छोटे क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल कर सकती हैं, बशर्ते कहानी और प्रस्तुति दमदार हो।





