नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। 2 ऑस्कर, 2 ग्रैमी और दर्जनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड जीतने वाले संगीतकार और सिंगर ए.आर. रहमान आज 59 साल के हो चुके हैं। दुनियाभर में अपने संगीत और हुनर से पहचाने जाने वाले रहमान का बचपन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा। मात्र 9 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया, जिससे घर की जिम्मेदारियां ए.आर. रहमान पर आ गईं। इतना छोटा होने के बावजूद उन्होंने परिवार का भरण-पोषण करना शुरू किया। गरीबी और अकेलेपन की वजह से पढ़ाई छोड़नी पड़ी, और एक समय ऐसा भी आया जब वे आत्महत्या के ख्याल से जूझते रहे।
उनका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था
ए.आर. रहमान का जन्म 6 जनवरी 1967 को तमिलनाडु में हुआ था। उनका जन्म हिंदू परिवार में हुआ था और उनका नाम दिलीप कुमार रखा गया था। उनके पिता आर.के. शेखर खुद एक फिल्म स्कोर कंपोजर थे और संगीत की दुनिया से जुड़े हुए थे। चार साल की उम्र में ही पिता ने रहमान को पियानो बजाना सिखा दिया। जिससे उनके संगीत में रुचि और हुनर का विकास हुआ। लेकिन 9 साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया।
मां को उनके पिता के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स किराए पर देने पड़ते थे।
पिता की मौत के बाद परिवार को गहरी गरीबी और जिम्मेदारियों का सामना करना पड़ा। घर चलाने के लिए मां को उनके पिता के म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स किराए पर देने पड़ते थे। छोटे रहमान को उन इंस्ट्रूमेंट्स को बजाना आता था, इसलिए उन्हें भी मदद करनी पड़ती थी। यही उनका पहला कमाई का अनुभव था।पिता के निधन के बाद, उनकी मां ने घर चलाने के लिए उनके पिता के म्यूजिक इंट्रूमेंट्स किराए पर दिए। चूंकि ए.आर. रहमान ये उपकरण बजा सकते थे, उन्हें उनके साथ जाना पड़ता और यहीं से उनकी पहली कमाई 50 रुपए हुई।
आर्थिक कठिनाइयों और जिम्मेदारियों के कारण उनका ध्यान पढ़ाई से हट गया।
आर्थिक कठिनाइयों और जिम्मेदारियों के कारण उनका ध्यान पढ़ाई से हट गया। उनकी स्कूल अटेंडेंस कम होने लगी और एग्जाम में लगातार फेल होने लगे। 2012 में दिए इंटरव्यू में रहमान ने बताया कि उनके स्कूल के प्रिंसिपल ने उनकी मां से कहा था, इस लड़के को स्कूल मत भेजो, सड़कों पर भीख मांगो। ये अनुभव उनके लिए बेहद दर्दनाक था।
बचपन और किशोरावस्था की इन कठिन परिस्थितियों ने उनके लिए उनके पुराने नाम को एक दर्द और संघर्ष की पहचान बना दिया। दिलीप कुमार नाम उन्हें उनके कष्टपूर्ण अतीत, पिता की मौत और गरीबी की याद दिलाता था। वह महसूस करते थे कि यह नाम उनके वर्तमान और भविष्य की पहचान को प्रतिबिंबित नहीं करता।छोटे रहमान ने पढ़ाई छोड़ने का निर्णय लिया और एम.सी.एन स्कूल में दाखिला लिया। वहीं उन्होंने एक छोटा बैंड भी बनाया। 15 साल की उम्र में उन्होंने मां की सलाह लेकर पढ़ाई पूरी तरह छोड़ दी और संगीत की दुनिया में पूरी तरह कदम रख दिया।
जब रहमान 20 साल के हुए, तो उनके जीवन में एक नया मोड़ आया।
जब रहमान 20 साल के हुए, तो उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। उनकी मां इस्लाम धर्म की ओर झुकी हुई थीं और उन्होंने रहमान पर इसका प्रभाव डाला। इसी वजह से उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल किया। धर्म परिवर्तन के साथ ही उन्होंने नाम बदलकर ए.आर. रहमान रख लिया। उन्होंने अपने पुराने नाम से नफरत जताई क्योंकि वह उनके दर्दभरे अतीत की याद दिलाता था।
नाम बदलना और धर्म परिवर्तन उनके लिए सिर्फ आध्यात्मिक या धार्मिक निर्णय नहीं था। यह एक नया जीवन शुरू करने का प्रतीक था। उन्होंने अपने पुराने दर्द, अपमान और संघर्षों को पीछे छोड़कर एक नई पहचान बनाई। ए.आर. रहमान ने अपने नाम के पीछे Allah Rakha (ईश्वर की सुरक्षा में) का अर्थ रखा, जो उनके जीवन की नई शुरुआत और सकारात्मक दिशा को दर्शाता है।
यहीं से उनकी संगीत की कामयाबी की राह शुरू हुई।
25 साल की उम्र में रहमान काफी निराशा में थे और उन्होंने आत्महत्या करने के बारे में भी सोचा। लेकिन इसी समय उन्होंने अपने घर के आंगन में एक छोटा सा रिकॉर्डिंग स्टूडियो बनाया, और यहीं से उनकी संगीत की कामयाबी की राह शुरू हुई।करियर की शुरुआत में रहमान ने कई डॉक्यूमेंट्री और एड्स के लिए संगीत तैयार किया। एक बार उनके एक जिंगल पर दक्षिण भारत के प्रसिद्ध फिल्ममेकर मणिरत्नम की नजर पड़ी और उन्होंने उन्हें अपनी फिल्म ‘रोजा’ के लिए साइन किया। यही फिल्म उनके फिल्मी सफर की शुरुआत बनी। 1992 में उन्होंने संतोष सिवन की फिल्म ‘योद्धा’ में काम किया।
फिल्म ने उन्हें हिंदी सिनेमा में लोकप्रियता दिलाई।
बॉलीवुड में उनका पहला म्यूजिक कंपोजर का काम 1995 की फिल्म रंगीला से शुरू हुआ। इस फिल्म ने उन्हें हिंदी सिनेमा में लोकप्रियता दिलाई। इसके बाद उन्होंने ताल, लगान, वन टू का फोर, साथिया, युवा, स्वदेश, रंग दे बसंती, रावण, रॉकस्टार जैसी फिल्मों में अपनी संगीत प्रतिभा का जादू दिखाया।रहमान ने 27 साल की उम्र में सायरा बी से अरेंज मैरिज की। सायरा उनसे छह साल छोटी थीं। इस शादी से उनके तीन बच्चे हुए।
उनकी पहली हॉलीवुड फिल्म एलिजाबेथ: द गोल्डन एज थी।
ए.आर. रहमान ने सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संगीत की पहचान बनाई। उनकी पहली हॉलीवुड फिल्म एलिजाबेथ: द गोल्डन एज थी। इसके बाद उन्होंने उन्होंने स्लमडॉग मिलियनेयर, कपल्स रिट्रीट, 127 आवर्स, पीपल लाइक अस और पेले जैसी इंटरनेशनल फिल्मों के लिए म्यूज़िक बनाया। 2019 में, उन्होंने एवेंजर्स: एंडगेम के लिए हिंदी, तमिल और तेलुगु में ‘मार्वल एंथम’ बनाया और गाया।
इसके अलावा रहमान ने 2019 में शो ‘द वॉइस’ में जज के तौर पर भी काम किया और भारत का पहला यूट्यूब ओरिजिनल ARRived लॉन्च किया। प्रोड्यूसर के रूप में उनकी पहली फिल्म 99 सॉन्ग्स 2019 में आई, जो डॉल्बी एटमॉस टेक्नीक का इस्तेमाल करने वाली पहली भारतीय साउंडट्रैक एल्बम थी।
2010 में उन्हें पद्म भूषण से भी नवाजा गया।
रहमान विवादों से भी अछूते नहीं रहे। 2022 में गृह मंत्री अमित शाह के हिंदी को इंग्लिश विकल्प बनाने की बात पर उन्होंने तमिल भाषा और तमिलियंस के अधिकार को रेखांकित करते हुए ट्वीट किया। उनका ये ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। ए.आर. रहमान ने अब तक कुल 138 अवॉर्ड्स जीते हैं, जिनमें 2 ऑस्कर, 2 ग्रैमी, 6 नेशनल फिल्म अवॉर्ड, 15 फिल्मफेयर अवॉर्ड, 17 फिल्मफेयर साउथ अवॉर्ड शामिल हैं। 2010 में उन्हें पद्म भूषण से भी नवाजा गया।
आज ए.आर. रहमान न केवल संगीत की दुनिया का चमकता सितारा हैं, बल्कि उनके संघर्ष और समर्पण की कहानी भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। गरीबी, अकेलापन और निराशा के बावजूद उन्होंने संगीत की शक्ति से खुद को दुनिया के सबसे बड़े कंपोजर्स और सिंगर्स में शामिल किया। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि सच्ची मेहनत, धैर्य और जुनून किसी भी बाधा को पार कर सकता है।




