नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। भारत में ज्यादातर बड़े उद्योगपति परिवारों के नियंत्रण में होते हैं, जहां मालिकाना हक और प्रबंधन एक ही परिवार के पास रहता है। लेकिन इसके बावजूद देश में कुछ ऐसी प्रतिष्ठित कंपनियां भी हैं, जिनका कोई व्यक्तिगत मालिक नहीं है। इन कंपनियों का संचालन ट्रस्ट, फाउंडेशन या पेशेवर बोर्ड के जरिए किया जाता है। ऐसा तब होता है, जब परिवार में कोई वारिस नहीं होता या अगली पीढ़ी व्यापार में रुचि नहीं दिखाती। यह मॉडल न सिर्फ कारोबार को स्थिरता देता है, बल्कि समाज और निवेशकों के भरोसे को भी मजबूत करता है।
टाटा ग्रुप: ट्रस्ट के हाथों में देश का सबसे बड़ा कॉरपोरेट साम्राज्य
भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में शामिल टाटा ग्रुप इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रतन टाटा के कोई प्रत्यक्ष वारिस नहीं हैं, इसलिए समूह की कमान पेशेवर नेतृत्व के हाथों में दी गई। पहले साइरस मिस्त्री और अब एन. चंद्रशेखरन टाटा ग्रुप के चेयरमैन हैं। हालांकि, टाटा ग्रुप की अधिकांश हिस्सेदारी आज भी टाटा ट्रस्ट्स के पास है। इन ट्रस्टों से होने वाला मुनाफा शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण जैसे कार्यों में लगाया जाता है।
महिंद्रा ग्रुप में भी पेशेवरों का दबदबा
महिंद्रा ग्रुप में भी पारंपरिक पारिवारिक उत्तराधिकार देखने को नहीं मिलता। आनंद महिंद्रा की बेटियों ने व्यापार में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई, जिसके चलते ग्रुप का संचालन मुख्य रूप से पेशेवर प्रबंधन के जरिए किया जा रहा है। यह उदाहरण बताता है कि आज के दौर में केवल पारिवारिक मालिकाना ही नहीं, बल्कि प्रोफेशनल मैनेजमेंट भी कंपनियों को सफलता की ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।
सिप्ला, बिसलेरी और बायोकॉन जैसे ब्रांड
भारत की प्रमुख दवा कंपनी सिप्ला भी इसी श्रेणी में आती है। इसके चेयरमैन यूसुफ हमीद के वारिस कारोबार में रुचि नहीं रखते, जिसके चलते कंपनी के भविष्य को लेकर रणनीतिक फैसले लिए जा रहे हैं। इसी तरह बिसलेरी और बायोकॉन जैसे ब्रांड्स में भी वारिसों की अनुपस्थिति के कारण पेशेवर प्रबंधन या ट्रस्ट आधारित मॉडल को अपनाया गया।
ट्रस्ट के भरोसे चलने वाली प्रमुख संस्थाओं में टाटा ट्रस्ट्स, इंफोसिस फाउंडेशन और अजीम प्रेमजी फाउंडेशन शामिल हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा ग्रुप की कई कंपनियों की बड़ी हिस्सेदारी है और यहां से होने वाला मुनाफा शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक कार्यों में लगाया जाता है। वहीं, इंफोसिस फाउंडेशन कंपनी की कमाई का उपयोग शिक्षा और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए करता है। इसी तरह अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, विप्रो से जुड़े संसाधनों के जरिए शिक्षा सुधार और समाज के समग्र विकास पर काम करता है। इन सभी संस्थाओं की खासियत यह है कि यहां किसी एक व्यक्ति का मालिकाना नहीं होता, बल्कि ट्रस्ट और बोर्ड के सामूहिक फैसलों से कंपनियों का संचालन होता है, जिससे पारदर्शिता और सामाजिक जिम्मेदारी दोनों बनी रहती हैं।
कैसे काम करता है ट्रस्ट मॉडल?
ट्रस्ट आधारित मॉडल में कंपनी का उद्देश्य केवल मुनाफा कमाना नहीं होता। इसमें पेशेवर मैनेजर्स और बोर्ड संचालन की जिम्मेदारी संभालते हैं। मुनाफे का बड़ा हिस्सा सामाजिक कार्यों में लगाया जाता है, जिससे पारदर्शिता, दीर्घकालिक स्थिरता और समाज का विकास सुनिश्चित होता है।





