नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में कड़ाके की ठंड के साथ घना कोहरा छाया हुआ है। हालात ऐसे हैं कि विजिबिलिटी बेहद कम हो गई है, जिसका सीधा असर फ्लाइट और ट्रेन संचालन पर पड़ रहा है। सिविल एविएशन मंत्रालय, एयर इंडिया, इंडिगो और दिल्ली एयरपोर्ट प्रशासन ने यात्रियों के लिए ट्रैवल एडवाइजरी जारी कर पहले ही चेतावनी दी थी कि उड़ानें लेट या कैंसल हो सकती हैं। इसी बीच यात्रियों के मन में यह सवाल उठता है कि जब आसमान में कोई ट्रैफिक नहीं दिखता, तो फिर फ्लाइट्स क्यों रोकी जाती हैं।
आसमान नहीं, रनवे पर होती है असली चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, फ्लाइट भले ही आसमान में उड़ती हो, लेकिन उसका संचालन पूरी तरह एयरपोर्ट के ग्राउंड सिस्टम और विजिबिलिटी पर निर्भर करता है। कोहरे के दौरान एयरपोर्ट पर दृश्यता कई बार 600 मीटर से भी कम रह जाती है। ऐसी स्थिति में पायलट को रनवे के संकेत, लाइट्स और अन्य विमानों की स्थिति साफ दिखाई नहीं देती। खासकर टैक्सीइंग यानी रनवे पर विमान को गेट से टेकऑफ पॉइंट तक ले जाना सबसे जोखिम भरा हो जाता है। यही वजह है कि कोहरे में ग्राउंड मूवमेंट को नियंत्रित करने के लिए फ्लाइट्स को रोकना पड़ता है।
टेकऑफ और लैंडिंग में क्यों बढ़ जाता है खतरा
कोहरे में टेकऑफ और लैंडिंग दोनों ही चुनौतीपूर्ण होते हैं। हर एयरपोर्ट और विमान के लिए न्यूनतम विजिबिलिटी के मानक तय हैं। यदि ये मानक पूरे नहीं होते, तो पायलट को टेकऑफ की अनुमति नहीं मिलती। मैन्युअल लैंडिंग के लिए आमतौर पर कम से कम 550 मीटर विजिबिलिटी जरूरी मानी जाती है। जब दृश्यता इससे नीचे चली जाती है, तो फ्लाइट को होल्ड पर रखा जाता है या फिर डाइवर्ट अथवा कैंसल करना पड़ता है।
यात्रियों की सुरक्षा सबसे बड़ी वजह
हवाई विशेषज्ञों का कहना है कि कोहरे में फ्लाइट कैंसिल करने का फैसला यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जाता है। कम विजिबिलिटी में एक छोटी सी गलती भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसलिए चाहे आसमान में ट्रैफिक न हो, लेकिन जब तक रनवे और ग्राउंड ऑपरेशन सुरक्षित न हों, तब तक उड़ान भरना संभव नहीं होता। यही कारण है कि घने कोहरे के दौरान फ्लाइट्स को रोकना या रद्द करना जरूरी हो जाता है।





