जेल में बंद अरविंद केजरीवाल चुनाव तो लड़ सकते हैं लेकिन वोट नहीं डाल पाएंगे; कैदियों के लिए क्या हैं अधिकार?

Arvind kejriwal: आपके मन में एक सवाल उठ रहा होगा कि जब उन्हें जेल में रहकर अपने मत का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है तो उन्हें जेल से चुनाव लड़ने का अधिकार कैसे है।
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नई दिल्ली, रफ्तार डेस्क। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने वाले भारत में चुनाव को लेकर सख्त नियम हैं। इन नियमों का पालन सख्ती से करवाने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है। लेकिन जेल में बंद कैदियों से जुड़े दो नियम ऐसे हैं जो थोड़ा कन्फ्यूज़ कर देते हैं। असल में जेल में बंद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस बार लोकसभा चुनाव में अपना वोट नहीं डाल पाएंगे। हालांकि, नियमों के अनुसार वो चुनाव में खड़े जरूर हो सकते हैं।

जिन व्यक्तियों पर ट्रायल चल रहा है, वे भी चुनाव में अपना वोट नहीं डाल सकते हैं

रिप्रेजेंटेटिव ऑफ पीपल एक्ट 1951 की धारा 62 (5) में ये साफ लिखा है, "कोई भी व्यक्ति जो जेल में बंद हो, चाहे सज़ा काट रहा हो या फिर ट्रायल में हो या किसी भी तरह से पुलिस की कस्टडी में हो वो किसी भी चुनाव में वोट नहीं डाल सकता है।" इसमें ये भी लिखा है कि यदि किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन या नजरबंदी में रखा गया है तो उस पर ये नियम लागू नहीं होगा।

जेल में बंद कौन व्यक्ति लड़ सकता है चुनाव?

अब सवाल आता है कि जब जेल में बंद व्यक्ति वोट नहीं डाल सकता है तो फिर वो चुनाव में खड़ा कैसे हो सकता है। दरअसल भारत का कानून किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं मानता है जब तक कोर्ट उसे दोषी साबित न करे। ऐसे में कोई भी व्यक्ति जो अंडर ट्रायल है उसके पास चुनाव लड़ने का अधिकार है। कानून के तहत जेल में बंद व्यक्ति के करीबी और उनके कार्यकर्ता उनके लिए प्रचार कर सकते हैं।

एक नियम ये भी है कि जब कोई सांसद या विधायक किसी मामले में दोषी पाए जाते हैं और उन्हें मिलने वाली सज़ा दो साल या उससे ऊपर की होती है तो बतौर सांसद या विधायक उन्हें डिस्क्वालिफाई कर दिया जाता है।

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