नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने के उद्देश्य से University Grants Commission (यूजीसी) ने Professor of Practice (PoP) की व्यवस्था शुरू की है। इस पहल के तहत अब ऐसे विशेषज्ञों को विश्वविद्यालयों में पढ़ाने का मौका दिया जा रहा है, जिनके पास अपने क्षेत्र में वर्षों का व्यावहारिक अनुभव है, भले ही उनके पास पारंपरिक शैक्षणिक डिग्रियां जैसे पीएचडी या नेट न हों।
प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस बनने की योग्यता
नाम से ही स्पष्ट है कि जो विशेषज्ञ अपनी फील्ड में महारत हासिल कर चुके होते हैं वह इस पद को प्राप्त करने के अधिकारी हो जाते हैं। ये पारंपरिक प्रोफेसर नहीं होते और जरूरी नहीं है कि इनके पास PhD या NET जैसे योग्यता हो। हालांकि इस पदवी को पाने के लिए अपनी इंटरेस्ट फील्ड में 15 साल का अनुभव होना जरूरी है।
इसमें कई क्षेत्रों के अनुभवी लोग शामिल हो सकते हैं:
- कलाकार (सिंगर, एक्टर)
- उद्योगपति / बिजनेस एक्सपर्ट
- पत्रकार
- इंजीनियर / टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट
- सेना या प्रशासनिक अधिकारी
Professor of Practice का मकसद
अब स्वभाविक है कि आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस को लाने का क्या मकसद है? इसका सीधा जवाब है कि UGC का मानना है कि छात्र केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रह जाएं बल्कि उनका मकसद है कि उन्हें रियल लाइफ स्किल्स भी सीखने को मिलें। प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस का कार्य छात्रों को प्रैक्टिक्ल नॉलेज उपलब्ध कराना है। इंडस्ट्री से जुड़े उदाहरण देकर इंडस्ट्री की समझ पैदा करना है। स्किल्स और करियर गाइडेंस देना है।
प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस पर एक्सपर्ट्स का क्या मत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुख और व्यावहारिक बनाने में मदद करेगा। आने वाले समय में इससे छात्रों को इंडस्ट्री की जरूरतों के अनुसार तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई जा सकती है।




