नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। फाल्गुन शुक्ल एकादशी को मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी 2026 इस बार भी काशी को श्रद्धालुओं से रंगों और भक्ति का महासागर बना देगी। ये रंगभरी एकादशीआज मनाई जा रही है।
यह दिन केवल भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी नहीं है, बल्कि काशी में इस दिन महादेव की विशेष पूजा का भी महत्व जुड़ जाता है, इसलिए इसे साल की एकमात्र ऐसी एकादशी माना जाता है जब हरि और हर की कृपा विशेष रूप से बरसती है।
होली खेलने की परंपरा
इस पर्व का केंद्र काशी विश्वनाथ मंदिर है, जहां महाशिवरात्रि के बाद बाबा विश्वनाथ का ‘गौना’ उत्सव शुरू होता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती को विधिवत काशी लेकर आते हैं। इसलिए इसे बाबा के दूल्हा रूप और माता पार्वती के नववधू स्वरूप का पर्व भी कहा जाता है। मंदिर परिसर में विशेष श्रृंगार, अबीर-गुलाल का अर्पण और प्रतीकात्मक रूप से बाबा के साथ होली खेलने की परंपरा पूरे भक्तों को आध्यात्मिक आनंद देती है।
इस दिन एकादशी व्रत रखना पुण्यकारी मानी जाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन एकादशी व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। वहीं काशी में इस दिन शिव आराधना भी विशेष पुण्यकारी मानी जाती है। भक्त शिवलिंग पर गुलाल अर्पित करते हैं, बिल्वपत्र चढ़ाते हैं और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते हैं, जिससे उन्हें दोगुना आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।
परंपरागत संस्थाओं की शोभायात्राएं निकलती हैं
रंगभरी एकादशी के दिन काशी की गलियां भक्तों से भर जाती हैं। देश-विदेश से आए श्रद्धालु गंगा घाटों से लेकर मंदिरों तक भक्ति और उल्लास का अनुभव करते हैं। अनेक अखाड़ों और परंपरागत संस्थाओं की शोभायात्राएं निकलती हैं, जिसमें संत, महात्मा और साधु शामिल होते हैं। हर-हर महादेव के जयघोष और गुलाल की बौछारें इस दिन को आध्यात्मिक होली का रूप देती हैं।
इस दिन किया गया जप, तप कई गुना पुण्यकारी
विवाहित महिलाएं इस दिन माता पार्वती की पूजा कर अखंड सौभाग्य और दांपत्य सुख की कामना करती हैं। धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किया गया जप, तप और दान कई गुना पुण्यकारी होता है। फाल्गुन मास स्वयं प्रेम, भक्ति और आनंद का प्रतीक माना जाता है, जिससे इस तिथि की आध्यात्मिक ऊर्जा और अधिक प्रबल हो जाती है।
काशी की जीवंत परंपरा
रंगभरी एकादशी सिर्फ एक व्रत या त्योहार नहीं है, बल्कि काशी की जीवंत परंपरा, शिव और विष्णु के एकत्व और रंगों से भरे आध्यात्मिक उत्सव का अद्भुत संगम है। साल में एक बार आने वाली यह एकादशी भक्तों के लिए किसी दिव्य पर्व से कम नहीं मानी जाती और इसे अनुभव करने वाले श्रद्धालु जीवनभर पुण्य और आनंद के सागर में डूब जाते हैं।





