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Saturday, March 7, 2026
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लड्डू, लट्ठ, फूल और गुलाल…जानिए क्‍यों खास  है ब्रजमंडल की होली, जिसे देखने दूर-दूर से आते हैं लोग 

ब्रजमंडल में मथुरा, गोकुल, बरसाना, वृंदावन, नंदगाव आदि कई गांव आते हैं। यहां पर वसंत पंचमी से ही होली के उत्सव की धूम शुरू हो जाती है।

नई दिल्‍ली/रफ्तार डेस्क। यूं तो पूरे भारत में रंगों का त्‍योहार होली बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। लेकिन ब्रजमंडल में खेली जाने वाली होली के रंग ही निराले हैं। यहां कुछ दिनों तक ही नहीं बल्कि पूरे एक महीने तक इस रंगों के उत्‍सव को मनाया जाता है। लड्डुओं की होली से लेकर लट्ठमार होली, फूलों की होली से लेकर दाऊ जी के हुरंगे तक… ब्रज में होली की रंगत सबसे अलग होती है, जिसमें शामिल होने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। 

वसंत पंचमी से होली के उत्सव की धूम होती है शुरू

ब्रजमंडल में मथुरा, गोकुल, बरसाना, वृंदावन, नंदगाव आदि कई गांव आते हैं। यहां पर वसंत पंचमी से ही होली के उत्सव की धूम शुरु हो जाती है। ब्रजमंडल में खासकर मथुरा में लगभग 45 दिन के होली के पर्व का आरंभ वसंत पंचमी से ही हो जाता है। बसंत पंचमी पर ब्रज में भगवान बांकेबिहारी ने भक्तों के साथ होली खेलकर होली महोत्सव की शुरुआत की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

लड्डुओं से होती है होली की शुरूआत 

ब्रज में होली की शुरुआत लड्डुओं की होली खेलकर होती है। बरसाना गांव से शुरू होने वाली इस होली को निमंत्रण का प्रतीक माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार राधा प्रतीक रूप से नंदगांव लड्डू लेकर जाती हैं और नंदगांव के हुरियारे हुड़दंग शुरू कर देते हैं। मीठे लड्डुओं की इस होली का नजारा देखने लायक होता है। 

होली की क्या है कथा

लड्डू होली से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है। जिसके अनुसार कंस के अत्याचारों से परेशान होकर नंदबाबा पूरे गांव के साथ गोकुल से दूर चले गए थे और नंदगांव बसाकर वहां रहने लगे। बरसाना गांव से उनके पुराने संबंध थे और तीज-त्योहार-व्रत में दोनों गांव वाले साथ उत्सव मनाते थे। लेकिन गोकुल से जाने के बाद जब दोनों गांवों के बीच दूरी बढ़ी तो लगा कि सिलसिला टू़ट जाएगा, तब राधारानी के पिता वृषभानु जी के कहने पर उनके गोप-गोपियां लड्डू लेकर होली का निमंत्रण देने नंदगांव गए थे। तभी से यह सिलसिला शुरू हुआ था। 

आज भी बरसाना से नंदगांव जाता है निमंत्रण 

आज भी बरसाना के राधाजी मंदिर से नंदगांव के लिए निमंत्रण के लड्डू भेजे जाते हैं और फिर नंदगांव से बिहारी जी के मंदिर से पंडा इस निमंत्रण पर राधाजी मंदिर पहुंचते हैं। यहां उनका उत्साह के साथ स्वागत होता है और विदाई में लड्डुओं की गठरी भेंट की जाती है. इन्हीं लड्डुओं को श्रद्धालुओं पर लुटाया जाता है। 

प्रेम- शरारत से भरी अनूठी परंपरा है लट्ठमार होली

ब्रज की लट्ठमार होली देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। यह सिर्फ रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, शरारत और परंपरा का अनूठा संगम है। लट्ठमार होली बरसाना और नंदगांव में खेली जाती है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की प्रेम कथा से जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ नंदगांव से बरसाना में होली खेलने आते थे। जब वे राधा और उनकी सखियों पर रंग डालते थे तो गोपियां उनसे अपना बचाव करने के लिए लाठियों (लट्ठ) से वार करतीं थीं। 

हुरियारे कपड़ों की बनी ढाल से अपना बचाव करते हैं

उपरोक्‍त कथा के अनुसार आज भी नंदगांव के हुरियारे बरसाना पहुंचते हैं और गोपिकाओं को रंग में सराबोर करने का प्रयास करते हैं। इसके जवाब में गोपियां उन्हें लाठियों से मारती हैं और हुरियारे कपड़ों की बनी ढाल से अपना बचाव करते हैं। ढोल-मृदंग की थाप पर यह अनोखी होली उमंग और उत्साह से भर देती है।

राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है फूलों की होली

फूलों की होली राधा-कृष्ण के आत्मीय प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। मान्‍यता है कि फुलेरा दूज के दिन ही श्रीकृष्ण का राधा रानी के साथ गंदर्भ विवाह हुआ था, जिसे खुद ब्रह्नाजी ने कराया था। इस विवाह की खुशी में सभी देवताओं ने उन पर फूलों की बारिश की थी। आज भी जब हिंदू विवाह रीति में किसी के विवाह के लिए सही तिथि नहीं मिल पाती है तो उसका विवाह फुलेरा दूज को किया जाता है, क्योंकि यह तिथि शादी विवाह के लिए अबूझ मुहूर्त है। राधा-कृष्ण से जुड़ी इसी मान्यता के बाद फूलों की होली भी मथुरा की संस्कृति का हिस्सा बन गई। 

देवर-भाभी की प्यार भरी नोक-झोक का प्रतीक है धुलेंडी

ब्रज में धुलेंडी बड़े ही धूमधाम के साथ मनाई जाती है। इस दिन देवर-भाभी के बीच प्यार भरी नोकझोक देखने को मिलती है। देवर भाभियों पर रंग डालते हैं और भाभियां उन्हें रंग में भीगे कपड़ों से बने सोटे से पीटती हैं, यह नजारा देखने लायक होता है। ब्रज में होली का समापन दाऊजी के हुरंगे से होता है, यह होली भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के सम्मान में खेली जाती है। इस दिन मथुरा में विशेष आयोजन होता है, राधा-कृष्ण को भोग लगाया जाता है और फिर धुलेंडी का उत्सव अपने चरम पर पहुंचता है। 

ब्रज की होली देखने दुनियाभर से पहुंचते हैं लोग

ब्रज में होली केवल एक पर्व नहीं बल्कि परंपरा, संस्कृति और भक्ति का अनूठा संगम मानी जाती है। ब्रज की हर गली, चौपाल और मंदिरों को होली के रंग में सराबोर देखा जा सकता है। यही कारण हैं कि दुनियाभर से लोग होली की इस अनूठी परंपरा का आनंद उठाने ब्रजधाम चले आते हैं।

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