नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का खास महत्व होता है, जिसमें हर बार की ही तरह इस बार भी ज्येष्ठ माह में आने वाली पूर्णिमा को वट सावित्री पूर्णिमा का व्रत किया जाएगा। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वट सावित्री व्रत का व्रत किया जाता है, जिसमें महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के राज्यों में वट सावित्री पूर्णिमा व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा के मौके पर रखा जाता है। लेकिन वहीं इस बार ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि दो दिन लग रही है ऐसे में इस व्रत को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है आइए जानते है कब है वट सावित्री व्रत ?
वट सावित्री पूर्णिमा व्रत कब है?
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत इस बार 10 जून को सुबह 11 बजकर 35 मिनट पर होगी। जिसका समापन अगले दिन यानी 11 जून को दोपहर 1 बजकर 13 मिनट पर होगा। ऐसे में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि का व्रत 10 जून को करना सही माना जा रहा है।
वट सावित्री पूर्णिमा पूजा विधि
वट सावित्री पूर्णिमा के दिन सुहागिन महिलाएं पूजा के लिए बांस की दो टोकरियां लेकर जिसमें एक में सात प्रकार के अनाज, कपड़े के दो टुकड़ों से ढक कर रखा जाता है। तो दूसरी टोकरी में मां सावित्री की प्रतिमा रखकर धूप, दीप, अक्षत, कुमकुम, मौली आदि से पूजा की जाती है। पूजा के दौरान वट वृक्ष पर रोली, कुमकुम, हल्दी, लगाने के साथ ही कच्चा सूत से लपेटकर वट वृक्ष की 7, 11 या फिर 21 बार परिक्रमा कर पूजा की जाती है। इसके साथ ही दीपक भी जलाया जाता है इसके बाद महिलाओं को सावित्री और सत्यवान की कथा सुननी चाहिए। महिलाओं को सावित्री और सत्यवान की कथा सुननी चाहिए।
वट सावित्री की कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, राजा अश्वपति और उनकी पत्नी मालवी की पुत्री का विवाह एक साधारण युवक सत्यवान के साथ हुआ जिसका नाम सावित्री था। चूकिं, सावित्री को पता था सत्यवान की उम्र ज्यादा नही है इसलिए वह हमेशा ही अपने पति की रक्षा के लिए प्रार्थना करती रहती थी। एक दिन जंगल में लकड़ी काटते समय सत्यवान गिर पड़े और उनकी मृत्यु हो गई। और यमराज प्राण लेने आए तो सावित्री ने यमराज का पीछा किया जिसका पीछा करते-करते वे यमलोक पहुंच गई और आख्रिरकार यमराज से अपने पति के प्राण वापस पाने के साथ अपने लिए अखंड सुहाग के साथ पुत्रपौत्र का आशीर्वादपाई ।





