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Sunday, March 29, 2026
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कब है हिंदू नववर्ष और इस दिन क्यो मनाते है गुड़ी पड़वा? जानें इसका सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व

भारत में हिंदू मान्यताओं के अनुसार नया साल एक जनवरी को ना होकर बल्कि मार्च और अप्रैल के महीने से शुरु होता है। वहीं महाराष्ट्र में मनाए जाने वाले गुड़ी पड़वा पर्व का भी अपना महत्व है।

नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। पूरे भारत व इसके आसपास क्षेत्रों में हिंदूनववर्ष को लेकर अलग-अलग मान्यताएं है। जिसमें हिंदू मान्यताओं के अनुसार नववर्ष एक जनवरी को ना होकर मार्च और अप्रैल के महीने से शुरु होती है जिसे सभी अपने तरीके से इसे मनाते है। वहीं इस बार का नववर्ष हर साल की तरह चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ही मनाया जाएगा। जिस दिन ‘गुड़ी पड़वा’ का पर्व भी धूमधाम से मनाया जाता है। जानें इस पर्व के महत्व, और इससे जुड़ी परंपराओं के बारे में।

गुड़ी पड़वा 2025 की तिथि

हिंदू पंचांगअनुसार, हर साल चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को ही गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाता है और इसी दिन से हिंदुओं का नया साल भी आरंभ हो जाता है। इस साल 2025 में ये खास तिथि 29 मार्च को शाम 4 बजकर 27 मिनट से शुरू हो रही है। जो अगले दिन यानी 30 मार्च को दोपहर 12 बजकर 49 मिनट पर खत्म होगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि का विशेष महत्व है। इसलिए गुड़ी पड़वा का पर्व इस बार 30 मार्च को मनाया जाएगा। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक नए साल की नई शुरुआत, सुख-समृद्धि और विजय का प्रतीक भी है।

महाराष्ट्र समेत कई अन्य राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है

जब सूरज की पहली किरण धरती पर आएं है और घर-घर में रंगोली की महक फैलने लगे, तब समझ जाइए कि गुड़ी पड़वा आ गया है। इस पर्व को महाराष्ट्र समेत कई अन्य राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व के साथ ही मां जगदंबा के पूजा भी आरंभ हो जाती है जो करीब नौ दिनों तक लगातार चलती है।  

क्यों घरों के बाहर गुड़ी (ध्वज) लगाया जाता है?

गुड़ी एक ध्वज या प्रतीक होता है, इसे भगवान ब्रह्मा का प्रतीक भी माना जाता है, कहते है, गुड़ी पड़वा के दिन ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। जिसे घर के दरवाजे, खिड़की या बालकनी में ऊंचाई पर लगाया जाता है। वहीं, ‘पड़वा’ का मतलब होता है चंद्र माह का पहला दिन, जिससे यह हिंदू पंचांग के नए साल की शुरुआत को दर्शाता है। इस नाम में छिपे दो शब्द ‘गुड़ी’ और ‘पड़वा’ का क्या अर्थ है, आइए जानते हैं।

कैसे बनाई जाती है गुड़ी? 

गुड़ी बनाने सबसे पहले एक तांबे या चांदी का कलश लिया जाता है और उसे बांस की छड़ी पर उल्टा रख दिया जाता है।फिर इसे चमकदार हरे या पीले कपड़े यानी साड़ी या धोती से सजाया जाता है

इस गुड़ी को नीम या आम के पत्तों व फूलों और मिठाई की माला से सजाया जाता है।

इसे घर के मुख्य द्वार या छत पर लगाया जाता है, ताकि बुरी शक्तियों को दूर किया जा सके और घर में खुशहाली बनी रहे।इस दिन सुबह शरीर पर तेल लगाकर स्नान करने की भी परंपरा है। 

इस दिन अच्छे स्वास्थ्य के लिए गुड़ के साथ नीम का कोपल खाने की भी परंपरा है। 

गुड़ी पड़वा नए संकल्प, नई ऊर्जा और नई शुरुआत का उत्सव है। जो हमें कहता है कि ”अब नया आरंभ हो चुका है, ठीक वैसे ही जैसे बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।

पूर्व दिशा में गुड़ी को लगाना शुभ माना जाता है।

पकवान, खासतौर पर पूरन पोली

इस दिन महाराष्‍ट्र में खासतौर पर मीठा बनना जरुरी होता है कहते है, गुड़ी पड़वा पर पूरन पोली न बने, तो पर्व अधूरा लगता है, चने की दाल और गुड़ से बनी यह पारंपरिक चपाती स्वाद नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी गुणकारी मानी जाती है। इस दिन खीर, आमटी और पूरन पोली का विशेष महत्व है। जो हमारे व्यवहार व आत्मा में मिठास घोल देता है। 

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