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Tuesday, March 3, 2026
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Dev Uthani Ekadashi 2023 देवउठनी एकादशी की पूजा विधि पूजा विधि और महत्व

देवउठनी दीपों के पर्व दिवाली के 11वें दिन बाद आती है। इस बार देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को मनाई जाएगी। इसके एक दिन बाद तुलसी का विवाह होगा। विवाह के साथ ही शुभ कार्यों के शुभ मुहूर्त शुरू हो जायेंगे।

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क: दिवाली के 11 वें दिन देवउठनी एकादशी मनाई जाती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन देवउठनी एकादशी का व्रत रखा जाता है।  कहते हैं कि इसी दिन भगवान विष्णु 4 महीने के बाद योग निद्रा से जागते है।  इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आराधना करने का विधान है। इस दिन से ही विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश,  जैसे मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। हालांकि देवउठनी एकादशी व्रत की तिथि को लेकर कई लोगों में कंफ्यूजन बना हुआ है। अगर आप उन्हीं में  से एक हैं तो हम आपको इस आर्टिकल में इस बताएंगे कि देवउठनी एकादशी कब है। शुभ मुहूर्त क्या है। और इसके पीछे का महत्व क्या है।

क्या है देवउठनी का शुभ मुहूर्त

हिंदू धर्म में इस त्योहार का काफी महत्व है। आपको बता दें कि देवउठनी का पर्व 23 नवंबर 2023 दिन गुरुवार के दिन कार्तिक मां शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को शाम 5:09 पर शुरू होगी और फिर इसका समापन 24 नवंबर 2023 शुक्रवार की शाम 7:45 मिनट पर समाप्त हो जाएगा।  इसी शुभ मुहूर्त के चलते तुलसी विवाह 24 नवंबर 2023 शुक्रवार के दिन होगा। 

देवउठनी एकादशी कब है

देवउठनी एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार देवउठनी एकादशी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। इस साल  देवउठनी एकादशी की तारीख 23 नवंबर 2023 है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष देवउठनी एकादशी तिथि 22 नवंबर 2013 बुधवार को रात्रि 11:30 बजे से शुरू होकर एकादशी तिथि 23 नवंबर 2023 रात्रि 9:00 बजे तक समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार 23 नवंबर को देवउठनी मनाई जाएगी। इसके ठीक अगले दिन तुलसी जी का विवाह होगा। 

पूजा विधि

* देवउठनी एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर  भगवान विष्णु जी की पूजा करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए।

* इसके बाद श्री हरि विष्णु की प्रतिमा के समक्ष उनके जागने का आह्वान करें।

* संध्या काल में पूजा स्थल पर घी के 11 दिए देवी देवताओं के समक्ष जलाने चाहिए।

* यदि संभव हो पाए तो गन्ने का मंडप बनाकर बीच में विष्णु जी की मूर्ति रखें। इससे प्रभु प्रसन्न होते है।

* इसके बाद भगवान हरि को गन्ने, सिंघाड़ा ,लड्डू और मौसमी  फलों को अर्पित करें।

* एकादशी की रात घी का दीपक जलाएं।

* अगले दिन हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण कर दें।

देवउठनी एकादशी का महत्व क्या है

वैदिक पंचांग के अनुसार हर साल  देवउठनीएकादशी आती है। आपको बता दें कि देवदास यानी देवउठनी एकादशी से भगवान विष्णु निद्रा में चले जाते हैं। जिससे सभी मांगलिक कार्य बंद हो जाते हैं। साथ ही देवउठनी एकादशी से भगवान विष्णु निद्रा में जागते हैं और चतुर्थ मास से समाप्त होता है। भगवान विष्णु के निद्रा से जागने के साथ ही सभी मांगलिक कार्य भी शुरू हो जाते हैं। देव को उठना एक अबूझ मुहूर्त होता है। जिसमें बिना पंचाग देख सभी मांगलिक कार्यक्रम किया जा सकते हैं। इसलिए किसी मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं होती। देवउठनी एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु और तुलसी जी का विवाह होता है। इस दिन घरों के बाहर और पूजा स्थल पर दिए जलाए जाते हैं। और रात में भगवान विष्णु समय देवी देवताओं की पूजा की जाती है।

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