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मां दुर्गा ने क्यों लिया कालरात्रि का विकराल रूप, जानिए ये अद्भुत कथा

मां दुर्गा ने क्यों लिया कालरात्रि का विकराल रूप? भोलेनाथ ने किस प्रकार किया माता का क्रोथ शांत। जानिए इसके पीछे की अद्भुत पौराणिक कथा।

नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। मां दुर्गा के अनेकों रूप हैं उनके नौ रूपों की नवरात्रि के दौरान पूजा अर्चना की जाती है। माता रानी के रूपों में से सातवां रूप मां कालरात्रि (Maa Kalratri) के नाम से जाना है। अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। उनका यह रूप दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाला और भक्तों की रक्षा करने वाला माना जाता है।

इस प्रकार प्रकट हुईं मां कालरात्रि

पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय शुंभ और निशुंभ नामक दो राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। उनके अत्याचारों से देवता और ऋषि-मुनि अत्यंत परेशान हो गए। सभी देवता मां दुर्गा की शरण में पहुंचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की। राक्षसों ने को भक्तों को परेशान करते हुए देख मता रानी क्रोधित हो गईं। तब मां दुर्गा ने अपने तेज से एक भयंकर रूप धारण किया, जिसे कालरात्रि कहा गया। उनका रंग काला था, बाल बिखरे हुए थे और आंखों से अग्नि की ज्वाला निकल रही थी। उनके इस रूप को देखकर ही राक्षस भयभीत हो जाते थे।

मां कालरात्रि प्रकट होने के बाद अपने विकराल रूप में आ गईं और युद्धभूमि में प्रवेश करते ही राक्षसों का संहार करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से कई दैत्यों का वध किया। अंततः उन्होंने शुंभ और निशुंभ के सेनापतियों का नाश किया और उनके अत्याचारों से संसार को मुक्त कराया।

भोलेनाथ ने मां कालरात्रि के क्रोध को किया शांत

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब मां दुर्गा ने राक्षसों का संहार करने के लिए उग्र रूप धारण किया, तब वे कालरात्रि/काली बनकर युद्ध में उतर गईं। उन्होंने असुरों का भयंकर विनाश किया, लेकिन उनका क्रोध इतना बढ़ गया कि वे रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। इस प्रचंड रूप से तीनों लोकों में भय फैल गया। देवताओं ने भगवान भोलेनाथ से मदद मांगी। तब भोलेनाथ ने युद्धभूमि में जाकर मां के सामने लेट गए। जब मां कालरात्रि आगे बढ़ीं, तो अनजाने में उनका पैर भोलेनाथ के ऊपर पड़ गया। जैसे ही उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अपने ही पति पर पैर रख दिया है, वे तुरंत शांत हो गईं और उनकी जीभ बाहर निकल आई।

भक्तों पर बनाएं रखती हैं कृपा

मां कालरात्रि का यह उग्र रूप केवल बुराई का नाश करने के लिए है, जबकि अपने भक्तों के लिए वह अत्यंत सौम्य और कृपालु होती हैं। जो भी सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, उसे भय, रोग और संकटों से मुक्ति मिलती है।कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम आसुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं।

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