नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । भारत के ओडिशा राज्य में स्थित पुरी का प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर न केवल अपनी भव्य रथ यात्रा के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां बनने वाले ‘महाप्रसाद’ के लिए भी दुनियाभर में श्रद्धा का केंद्र है। हर साल आषाढ़ महीने में निकलने वाली रथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन करने पुरी पहुंचते हैं। इस दौरान मंदिर में जो प्रसाद तैयार होता है, उसे पवित्र और चमत्कारी माना जाता है। मान्यता है कि इस प्रसाद को श्रद्धा से ग्रहण करने से जीवन की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं, परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इसे ‘मोक्ष दिलाने वाला प्रसाद’ भी कहा जाता है।
पुरी जगन्नाथ मंदिर की रसोई को दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोई कहा जाता है। यहां हर दिन हजारों-लाखों लोगों के लिए प्रसाद पकाया जाता है। विशेष बात यह है कि इस रसोई में तीन तरह के प्रसाद बनाए जाते हैं। इन तीन प्रकारों में से एक को ‘मोक्ष प्रसाद’ कहा जाता है। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि ये दिव्य प्रसाद कैसे तैयार होता है और इसे इतना विशेष क्यों माना जाता है।
कौन से हैं वे तीन प्रकार के प्रसाद ?
पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर विशेष प्रसाद के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां तीन प्रकार के प्रसाद तैयार किए जाते हैं। हर एक का अपना महत्व और नियम है। आइए जानते हैं इन तीनों प्रसादों के बारे में :-
1. संकुड़ी प्रसाद
‘संकुड़ी प्रसाद’ सबसे पवित्र प्रसाद माना जाता है, जिसे केवल मंदिर परिसर के अंदर ही ग्रहण किया जा सकता है। इसे बाहर ले जाना सख्त वर्जित है। इस प्रसाद का सेवन मंदिर में बैठकर, श्रद्धा के साथ किया जाता है, जिससे आध्यात्मिक शुद्धि मानी जाती है।
2. सुखिला प्रसाद
‘सुखिला प्रसाद’ यानी सूखा प्रसाद, जिसमें सूखी मिठाइयाँ, लड्डू, खाजा और नमकीन सामग्री शामिल होती है। इसे भक्त अपने साथ घर ले जा सकते हैं और अपने परिजनों, मित्रों तथा रिश्तेदारों में बाँट सकते हैं। यह प्रसाद मंदिर की स्मृति स्वरूप माना जाता है।
3. निर्मला प्रसाद (मोक्ष प्रसाद)
तीनों में सबसे विशेष होता है ‘निर्मला प्रसाद’, जिसे ‘मोक्ष प्रसाद’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसे श्रद्धा से ग्रहण करने पर व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। विशेष रूप से कहा जाता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट हो और वह यह प्रसाद ग्रहण कर ले, तो उसे मोक्ष मिल सकता है। इस प्रसाद को एक अत्यंत पवित्र स्थान ‘कोइली बैकुंठ’ में तैयार किया जाता है। यही वह स्थान है जहां भगवान जगन्नाथ की पुरानी और सेवा-निवृत्त प्रतिमाओं को पूरे विधि-विधान से दफनाया जाता है। इस स्थान को मंदिर परिसर का आध्यात्मिक हृदय कहा जाता है।
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। )




