नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। इस बार भाद्रपद कृष्ण अष्टमी पर मनाई जा रही भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कई शुभ संयोगों का साक्षी बनेगी। 16 अगस्त को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व न केवल रोहिणी नक्षत्र, बल्कि अमृतसिद्धि और सर्वार्थसिद्धि योग जैसे अत्यंत शुभ योगों का संगम लेकर आ रहा है।
पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि का आरंभ 15 अगस्त को रात 11:48 बजे से हो रहा है, जबकि रोहिणी नक्षत्र का आगमन 17 अगस्त की सुबह 4:38 बजे होगा। ऐसे में शास्त्रों की मान्यता के अनुसार जब रोहिणी और अष्टमी का योग एक साथ न बने, तो उदया तिथि को ही श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इसी कारण इस वर्ष जन्माष्टमी 16 अगस्त को पूरे भारत में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी।
दुर्लभ है यह संयोग
वेदाचार्यों के अनुसार इस बार का जन्माष्टमी योग अत्यंत दुर्लभ है। अमृतसिद्धि योग और सर्वार्थसिद्धि योग उस दिन बनने से यह समय संकल्प, साधना और सिद्धि के लिए विशेष रूप से फलदायक माना जा रहा है।
भरणी, कृतिका और रोहिणी नक्षत्रों की उपस्थिति इस पर्व को शक्तिप्रदायक और कल्याणकारी बना रही है। ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि इस योग में यदि श्रद्धा पूर्वक व्रत, उपवास और पूजन किया जाए तो जीवन में सभी कष्टों का निवारण होता है।
मंदिरों में गूंज रहा भक्ति का स्वर, तैयारियां चरम पर
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर शहर के मंदिरों में विशेष तैयारियां की जा रही हैं। राजधानी समेत देशभर के शक्ति मंदिर, खड़ेश्वरी मंदिर, स्वामीनारायण मंदिर सहित अन्य कृष्ण मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों और फूलों से सजाया जा रहा है।
मंदिरों में श्रीकृष्ण लीला, रासलीला, झूला उत्सव, श्रीमद्भागवत कथा और रात्रि कीर्तन का आयोजन होगा। रात्रि 12 बजे, जैसे ही श्रीकृष्ण के जन्म का समय होगा, लड्डू गोपाल को झूले में झुलाकर जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
घरों में भी विशेष पूजन और सजावट
घर-घर में लड्डू गोपाल को नए वस्त्र पहनाए जाएंगे, उन्हें झूले में विराजमान किया जाएगा। श्रद्धालु फूलों, दीपों और माखन-मिश्री के भोग से भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करेंगे। मध्यरात्रि में भजन-कीर्तन के साथ श्रीकृष्ण का अभिषेक होगा और महाप्रसाद वितरण किया जाएगा।
कृष्ण भक्ति से मिलती है आत्मिक शांति
वेदाचार्यों का मानना है कि जन्माष्टमी का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मिक अनुशासन और इंद्रियों पर विजय का पर्व भी है। श्रीकृष्ण का जन्म भविष्य के प्रति आस्था, अधर्म पर धर्म की विजय, चेतना की जागृति का प्रतीक है।
इस दिन किए गए संकल्प और साधना से जीवन में न केवल धैर्य और विवेक का विकास होता है, बल्कि कृष्ण कृपा से मनुष्य के दुखों का भी नाश होता है। इस पावन अवसर पर हम सबको चाहिए कि कृष्ण के जीवन से प्रेरणा लें, सत्य, धर्म और सेवा को जीवन का आधार बनाएं और इस शुभ संयोग का लाभ उठाकर अपनी आत्मा को ईश्वर से जोड़ें।





